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अच्छा होता भारत से उठ जाती बेईमानी

अच्छा होता भारत से उठ जाती बेईमानी की अर्थी फलत विघ्नविनाशक जी की आज चतुर्थी अपने आस पास का करते दूर प्रदुसन तो सच मुच सार्थक होता ये पर्व पर्युषण घन वरसा मन भिज गया भोले भाव में भूल-भूल कर तीज गया तीनो पर्वो के संग सुन्दर ईद बधाई कंचन का स्वीकार करे सब पाठक भाई

मैं तुम्हें श्रृंगार देता

मैं तुम्हें श्रृंगार देता कब कहाँ अवसर मिला कि मैं तुम्हे श्रृंगार देता भावनाओ मे सदा बहता रहा गैर को अपना सदा कहता रहा रेत को पानी समझ मै हिरनसा दौड़ता गिरता रहा ढहता रहा तुम नहीं मुझको मिली कि मै तुम्हे उपहार देता कब कहाँ अवसर मिला कि मैं तुम्हे श्रृंगार देता चाँदनी थी चाँद भी उस ओर था रात्रि की निस्तब्धता का शोर था स्वच्छ जल धारा नदी का छोर था तुम रही उस पार मै इस ओर था हाथ बढ़ पाये नहीं कि मै तुम्हे अभिसार देता कब कहाँ अवसर मिला कि मैं तुम्हे श्रृंगार देता लाजवंती सा तुम्हारा सिमट जाना वल्लरी जैसे ह्रदय से लिपट जाना स्वप्न में हर रात सब होता रहा दूर जाना और क्षण में निकट आना चेतना तब थी नहीं की मै तुम्हे यह प्यार देता कब कहाँ अवसर मिला कि मैं तुम्हे श्रृंगार देता