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मर्यादा ( कहानी );डा.उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन'

     गत वर्ष की भांति इस वर्ष भी जुलाई आते- आते मकान का निचला हिस्सा किराए पर उठ गया  और उसी तरह के पढ़ने वाले पाँच लड़के यहाँ आ बसे |     जयन्तीके पिता के मरने के बाद घर का खर्च इसी किराए से चलता आया है | और ग़रीब दुखियारी माँ अपनी सयानी बेटी को लेकर कलेजे पे पत्थर रखे .अकेली -अकेली रह रही है|     हर साल भलेमानुष लडकों को वह मकान का निचला हिस्सा किराए पर उठा देती और परीक्षाओं के बाद वे कमरे खाली हो जाते |      पति नगर पालिका में क्लर्क थे | रिटायर होने में दो साल की देरी थी | तभी अचानक एक दिन दिल का दौरा पड़ा और चल बसे | तब से अब में जमीन- आसमान का -सा अंतर हो गया है | दस वर्ष गुजर गये इसी सहारे जीवन यापन करते |      इस साल पैसों की तंगी और अधिक हो आयी थी | मंहगाई ने आधी जान निकाल ली थी | इस लिए पास –पड़ोस  के कई लोगों से जयन्ती की माँ ने कह  रखा था कि कोई अच्छा किरायेदार मिल जाय तो हमारे यहाँ भेज देना | सो बगल के प्रोफसर साहब ने इन्हीं लड़कों  को रखवा दिया था | ...