संदेश

जून, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कंचन जी का साहित्यिक प्रतिमान

चित्र

खोती सम्वेदनाओं के सूत्रधार कंचन जी

चित्र

वह जा न सका[कहानी ] :डा उमा शंकर चतुर्वेदी "कंचन"

      समाचार –पत्र पढ़ने के बाद एकाएक श्याम की विचारश्रृंखला जाने कैसे वर्षों पीछे चली गयी और याद आया उस दिन काफी देर की प्रतीक्षा के बाद अपने निश्चित समय से डेढ़ घंटा लेट गाड़ी आयी थी |   और गाड़ी में भीड़ इस कदर थी कि पाँव रखना दूभर हो रहा था | जब कि उसे लखनऊ जाना अत्यावश्यक था | जेठ महीने की कड़ाके की धूप और लू अपनी चरम सीमा पर थी|आये दिन दो –चार ख़बरें अखबार में पढ़ने को मिलती थीं कि लू से अमुक जगह इतने मरे|   भीड़ की हालत यह  थी कि लोग ट्रेन की छतों पर भी बैठे थे | उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे| तभी गाड़ी प्लेटफार्म से गार्ड के भिसिल के साथ सरकने लगी और अंततः बाध्य होकर एक डिब्बे के दरवाजे पर डंडा पकड़कर पाँँवदान पर खड़ा हो गया था|   अगला स्टेशन आया तो उसने सोचा कुछ लोग जरूर उतरेंगे और उसे जगह मिल जायेगी , पर यहाँ और भीड़ दिखी | परिणामत: उसे ज्यों का त्यों अपने स्थान से चिपक जाना हुआ |   लेकिन अब उसका हाथ भी दर्द से भर गया था | एक हाथ से बैग और दूसरे से डंडा थामे वह  किंकर्तव्य विमूढ़ सा बना रहा और पसीने से फिसल रहे हाथ को र...

अन्तर {कहानी } - डॉ. उमाशंकर चतुर्वेदी कंचन

‘ अबे वो ! ऐ ! ऐ रिक्शेवाले !आर्यनगर चलेगा ?’ होटल के सीढ़ी से उतरते ही   लम्बे छरहरे युवक ने कहा जो मोटे के हाथ में हाथ मिलाये हुए था |   ‘ नहीं बाबूजी !मैं उधर नहीं जाऊँगा , मुझे पी.रोड जाना है रिक्सा जमा करने |’     ‘ ये रिक्से वाले भी साले बड़े हरामी होते हैं ,खाली चले जायेंगे मगर यह नहीं कि कोई सवारी मिल गयी तो दो मिनट में उसे पहुंचा दे|’- मोटे युवक ने कहा |   तभी उधर से एक और रिक्सा गुजरा तब पतले युवक ने ही फिर पूँछा – ‘क्यों जी रिक्सेवाले आर्यनगर   चलोगे ?’   ‘ हाँ , चलूँगा क्यों नहीं बाबूजी |’   ‘कितने पैसे लोगे ?’ समीप आकर रिक्शेवाले के मुँह के पास मुँह ले जाकर उसी पतले युवक ने पूछा |   तब दूसरी तरफ मुख करके एक लम्बी सांस छोड़ते हुए रिक्शेवाले ने कहा – डेढ़ रुपया |’ ‘क्यों, मुँह क्यों घुमा लिया ?’   ‘आँय .. कुछ नहीं बाबूजी ऐसे ही |’   ‘ हूँ ह : दर्शन करने को भी कभी नहीं मिला होगा और मुँह घुमा रहा है ’ -मोटे युवक ने उपेक्षात्मक ढंग से हँसते हुए कहा |   और तब रिक्सावाला चल दिया कि क्षण भर मौन रहने के...