‘ अबे वो ! ऐ ! ऐ रिक्शेवाले !आर्यनगर चलेगा ?’ होटल के सीढ़ी से उतरते ही लम्बे छरहरे युवक ने कहा जो मोटे के हाथ में हाथ मिलाये हुए था | ‘ नहीं बाबूजी !मैं उधर नहीं जाऊँगा , मुझे पी.रोड जाना है रिक्सा जमा करने |’ ‘ ये रिक्से वाले भी साले बड़े हरामी होते हैं ,खाली चले जायेंगे मगर यह नहीं कि कोई सवारी मिल गयी तो दो मिनट में उसे पहुंचा दे|’- मोटे युवक ने कहा | तभी उधर से एक और रिक्सा गुजरा तब पतले युवक ने ही फिर पूँछा – ‘क्यों जी रिक्सेवाले आर्यनगर चलोगे ?’ ‘ हाँ , चलूँगा क्यों नहीं बाबूजी |’ ‘कितने पैसे लोगे ?’ समीप आकर रिक्शेवाले के मुँह के पास मुँह ले जाकर उसी पतले युवक ने पूछा | तब दूसरी तरफ मुख करके एक लम्बी सांस छोड़ते हुए रिक्शेवाले ने कहा – डेढ़ रुपया |’ ‘क्यों, मुँह क्यों घुमा लिया ?’ ‘आँय .. कुछ नहीं बाबूजी ऐसे ही |’ ‘ हूँ ह : दर्शन करने को भी कभी नहीं मिला होगा और मुँह घुमा रहा है ’ -मोटे युवक ने उपेक्षात्मक ढंग से हँसते हुए कहा | और तब रिक्सावाला चल दिया कि क्षण भर मौन रहने के...