प्रीत की चुनर रंगा दो
प्रीत की चुनर रंगा दो
कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो
सत्य को मैं सत्य मानु
झूठ को पहचान पाऊ
नेत्र से जो दूर है
अस्तित्व उसका जान पाऊं
दूर होवे द्वेष ईर्ष्या मन का मेरे तम भगा दो
कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो
बात कैसी है अनूठी
प्रीत करना और रोना
रत्न अपने हाथ लेकर
और अपने हाथ खोना
मैं समझ पाऊं सभी कुछ भाव तुम मेरे जगा दो
कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो
दीप लेकर आ पड़ा है
द्वार पर कोई पुजारी
मन करे करना वही तुम
प्रार्थना सुन लो हमारी ।
बस यही इच्छा कि फिर से प्रीत कि चूनर रंगा दो
कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो
मै स्वयं को भुला जाऊं
इस तरह कि प्रीत दे दो ,
रात - दिन मै गीत गाऊ
इस तरह के गीत दे दो
दे नहीं सकती तो मोइके से मुझे डोली मँगा दो
कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो
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