कहाँ करे विश्राम
कहाँ करे विश्राम
सुबह हुई जीवन की मेरे और हुई कब शाम ।
पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।
नयना हो गये गंगा-यमुना
अश्रु न फिर भी रीते ।
जीवन रण में लड़े बहुत पर
एक युद्ध न जीते ॥
हुई कौन सी गलती जिससे हुए विधाता वाम ।
पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।
उड़ पाऊं उन्मुक्त गगन में
समझू जग की रीत ।
तब तक हाथ छुड़ाकर भागा
मेरे मन का मीत
सबके वादे झूठे निकले कोई न आया काम ।
पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।
एक रतन ऐसा भी पाया
जिसे संजोते जनम गँवाय ।
राह कटीली राह रसीली
कहीं धुप तो कहीं है छाया ॥
पागल मन यह समझ न पाये कहाँ करे विश्राम ।
पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।
जगती का ये खेल अनूठा
बिना पिया के जीवन ठुठा।
माया में मन समझ न पाया
कौन है सच्चा , कौन है झूठा ॥
अर्थ ढूंढ़ता रहा अहर्निश किन्तु रहा निष्काम ।
पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।
aap ki kavita acchi hai
जवाब देंहटाएंजगती का ये खेल अनूठा
जवाब देंहटाएंबिना पिया के जीवन ठुठा
..यही सार तत्व है.
हेडर में बनारस का चित्र तो अच्छा लग रहा था..और ढूंढिए और सुंदर टेम्पलेट्स मिलेंगे. शब्द वैरिफिकेशन भी आपने नहीं हटाया...?
जवाब देंहटाएंwahwa...kya baat hai.....
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