नयनों की प्याली में अमृत नयनों की प्याली में अमृत बार - बार तुमने परसा है। लुक छिपकर तेरा वह मिलना गन्धित पुष्प कली सा खिलना कुंचित केशों का विन्यास तेरे अधरों का मधुहा स याद मुझे है, लखने खातिर बार - बार ये मन तरसा है। नयनों की प्याली में अमृत बार - बार तुमने परसा है। चैत चाँदनी की वे रातें तेरी मधुर - मधुर वे बातें अमराई के मध्य बोलना मीठा - मीठा दर्द घोलना खेल - खेल में बीत गये दिन आखों ने सब कुछ दरसा है। नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥ खुश होना और कभी रिसाना रोब देखाना और मनाना बिन बोले तेरा रह जाना आखों से सब कुछ कह जाना तेरी मनवाली कर - करके , बार - बार ये मन हरषा है। नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥ रिस्ते नाते टूट गये सब काफी पीछे छूट गये सब हाथों को ही बस मलना है निरा अकेले ही चलना है । जब -जब याद किया मैंने इन आखों से ही मन बरषा है। नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥
कहाँ करे विश्राम सुबह हुई जीवन की मेरे और हुई कब शाम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। नयना हो गये गंगा-यमुना अश्रु न फिर भी रीते । जीवन रण में लड़े बहुत पर एक युद्ध न जीते ॥ हुई कौन सी गलती जिससे हुए विधाता वाम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। उड़ पाऊं उन्मुक्त गगन में समझू जग की रीत । तब तक हाथ छुड़ाकर भागा मेरे मन का मीत सबके वादे झूठे निकले कोई न आया काम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। एक रतन ऐसा भी पाया जिसे संजोते जनम गँवाय । राह कटीली राह रसीली कहीं धुप तो कहीं है छाया ॥ पागल मन यह समझ न पाये कहाँ करे विश्राम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। जगती का ये खेल अनूठा बिना पिया के जीवन ठुठा। माया में मन समझ न पाया कौन है सच्चा , कौन है झूठा ॥ अर्थ ढूंढ़ता रहा अहर्निश किन्तु रहा निष्काम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।
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