मैं क्या करूँ ?
प्यार करना नहीं चाहता हूँ मगर-
हाथ कोई बढ़ाये तो मैं क्या करूँ ?
रूप की चाँदनी में नहाया नहीं,
नीर नयनों से मैंने बहाया नहीं,
नैन को मूँद कर चल रहा हूँ मगर-
नैन कोई लड़ाये तो मैं क्या करूँ ?
हाथ से मैं कलम तक छुआ भी नहीं,
शब्द का बोध मुझको हुआ भी नहीं,
गीत गाना नहीं चाहता हूँ मगर-
गीत कोई कढ़ाये तो मैं क्या करूँ ?
हाथ छेनी हथौड़ी गहा तक नहीं,
मूर्तिकारों के संग में रहा तक नहीं,
मूर्ति छूने से डरता रहा हूँ मगर-
मूर्ति कोई गढ़ाए तो मैं क्या करूँ ?
मन्दिरों में कभी पग बढाया नहीं,
देवताओं को मस्तक झुकाया नहीं,
फिर हृदय से मुझे देवता मानकर-
फूल कोई चढ़ाये तो मैं क्या करूँ ?
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