नयनों की प्याली में अमृत
नयनों की प्याली में अमृत नयनों की प्याली में अमृत बार - बार तुमने परसा है। लुक छिपकर तेरा वह मिलना गन्धित पुष्प कली सा खिलना कुंचित केशों का विन्यास तेरे अधरों का मधुहा स याद मुझे है, लखने खातिर बार - बार ये मन तरसा है। नयनों की प्याली में अमृत बार - बार तुमने परसा है। चैत चाँदनी की वे रातें तेरी मधुर - मधुर वे बातें अमराई के मध्य बोलना मीठा - मीठा दर्द घोलना खेल - खेल में बीत गये दिन आखों ने सब कुछ दरसा है। नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥ खुश होना और कभी रिसाना रोब देखाना और मनाना बिन बोले तेरा रह जाना आखों से सब कुछ कह जाना तेरी मनवाली कर - करके , बार - बार ये मन हरषा है। नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥ रिस्ते नाते टूट गये सब काफी पीछे छूट गये सब हाथों को ही बस मलना है निरा अकेले ही चलना है । जब -जब याद किया मैंने इन आखों से ही मन बरषा है। नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥
बगल में सुंदर किताब है, जनाब समाचार पढ़ रहे हैं!
जवाब देंहटाएंदेवेन्द्र जी की टिप्पड़ी सच लाजवाब है
जवाब देंहटाएंसुंदर है दृष्टि इसलिए सुन्दर शवाब है
मैं हूँ प्रकाशवान तो वो आफताब है
कविता में चमक चांदनी का महताब है
कंचन में जो निखार है उसका वो आब है
पूजा है, प्यार और मेरा भाव, ख्वाब है
जिससे हमारी जिन्दगी का ज्ञानपुंज है
सच है कि बंधु ! जिन्दगी ,पत्नी ,किताब है
मुबारक हो श्रीमान! आप ठहरे प्रचंड विद्वान।
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