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गाँव हमारा शहर हो गया

गाँव हमारा शहर हो गया . सुन्दर सुन्दर बाग़ कट गये  नहर  कूप तालाब पट गाये  आपस के भाई चारे के - जाने कैसे भाव घट गए   आरक्षण की राजनीति में जात-पात का जहर बो गया .          गाँव हमारा शहर हो गया .  दूध दही का लोप हो गया  जाने किसका कोप हो गया  डाँटी सास बहू को तो फिर - समझो गोला तोप  हो गया  सम्बन्धों का ताना -बाना आपे से ही बहर हो गया  गाँव हमारा शहर हो गया  भयवद्दी का भात नहीं है  जनवासा बारात  नहीं   है    दरवाजे खटिया पर सोये - अब वैसी अवकात नहीं है  राग द्वेष के खींच तान में    -  कुछ  ऐसा माहौल हो गया  गाँव हमारा शहर हो गया  अब कोई कोल्हाड़ नहीं  है  भड़भूजे  का भाड़ नहीं है   सुबह शाम औरतें जा सकें - ऐसा जंगल झाड़ नहीं है . पटवारी की पत्रावलि में जाने कैसे कहाँ खो गया  गाँव हमारा शहर हो गया  लोगों में वह भाव नहीं है  पहले जैसा चाव नहीं ...
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 डॉ कंचन  डॉ कंचन एवं डॉ सविता  
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डॉ कंचन एवं डॉ सविता 
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डॉ उमाशंकर चतुर्वेदी कंचन एवं डॉ सविता चतुर्वेदी प्रातः भ्रमण के दौरान बी एच यू  परिसर में