गाँव हमारा शहर हो गया
गाँव हमारा शहर हो गया . सुन्दर सुन्दर बाग़ कट गये नहर कूप तालाब पट गाये आपस के भाई चारे के - जाने कैसे भाव घट गए आरक्षण की राजनीति में जात-पात का जहर बो गया . गाँव हमारा शहर हो गया . दूध दही का लोप हो गया जाने किसका कोप हो गया डाँटी सास बहू को तो फिर - समझो गोला तोप हो गया सम्बन्धों का ताना -बाना आपे से ही बहर हो गया गाँव हमारा शहर हो गया भयवद्दी का भात नहीं है जनवासा बारात नहीं है दरवाजे खटिया पर सोये - अब वैसी अवकात नहीं है राग द्वेष के खींच तान में - कुछ ऐसा माहौल हो गया गाँव हमारा शहर हो गया अब कोई कोल्हाड़ नहीं है भड़भूजे का भाड़ नहीं है सुबह शाम औरतें जा सकें - ऐसा जंगल झाड़ नहीं है . पटवारी की पत्रावलि में जाने कैसे कहाँ खो गया गाँव हमारा शहर हो गया लोगों में वह भाव नहीं है पहले जैसा चाव नहीं ...