उलट गई संवेदना ,पलट गया व्यवहार। मात पिता लगने लगे ,अब बासी अखबार।। राजा वेश्या अग्नि यम ,बच्चा याचक चोर। पर पीड़ा जाने नहीं ,नहीं आंख की लोर।। सत्ता पाने के लिए, सब पागल बेचैन। मिर्चा को गुड़ बोलते ,दिन को कहते रैन।।
नयनों की प्याली में अमृत नयनों की प्याली में अमृत बार - बार तुमने परसा है। लुक छिपकर तेरा वह मिलना गन्धित पुष्प कली सा खिलना कुंचित केशों का विन्यास तेरे अधरों का मधुहा स याद मुझे है, लखने खातिर बार - बार ये मन तरसा है। नयनों की प्याली में अमृत बार - बार तुमने परसा है। चैत चाँदनी की वे रातें तेरी मधुर - मधुर वे बातें अमराई के मध्य बोलना मीठा - मीठा दर्द घोलना खेल - खेल में बीत गये दिन आखों ने सब कुछ दरसा है। नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥ खुश होना और कभी रिसाना रोब देखाना और मनाना बिन बोले तेरा रह जाना आखों से सब कुछ कह जाना तेरी मनवाली कर - करके , बार - बार ये मन हरषा है। नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥ रिस्ते नाते टूट गये सब काफी पीछे छूट गये सब हाथों को ही बस मलना है निरा अकेले ही चलना है । जब -जब याद किया मैंने इन आखों से ही मन बरषा है। नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥
कहाँ करे विश्राम सुबह हुई जीवन की मेरे और हुई कब शाम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। नयना हो गये गंगा-यमुना अश्रु न फिर भी रीते । जीवन रण में लड़े बहुत पर एक युद्ध न जीते ॥ हुई कौन सी गलती जिससे हुए विधाता वाम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। उड़ पाऊं उन्मुक्त गगन में समझू जग की रीत । तब तक हाथ छुड़ाकर भागा मेरे मन का मीत सबके वादे झूठे निकले कोई न आया काम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। एक रतन ऐसा भी पाया जिसे संजोते जनम गँवाय । राह कटीली राह रसीली कहीं धुप तो कहीं है छाया ॥ पागल मन यह समझ न पाये कहाँ करे विश्राम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। जगती का ये खेल अनूठा बिना पिया के जीवन ठुठा। माया में मन समझ न पाया कौन है सच्चा , कौन है झूठा ॥ अर्थ ढूंढ़ता रहा अहर्निश किन्तु रहा निष्काम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।
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