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धर्म ( कहानी )

धर्म ( कहानी )           अभी-अभी परसों की बात है ,  अरविन्द जी पूरे जोर -शोर से धर्म की वकालत किये जा रहे थे तभी हमदम जी आ खड़े हुए थे , और हम लोगों ने उन्हें बाइज्जत कुर्सी पर बैठा लिया था , वे भी पूरे मनोयोग से हम लोगों की बातों में मशगूल हो गये थे , किन्तु उनके धैर्य का बाँँध उस समय टूट गया जब अरविन्द जी की हाँ में हाँ मिलाते    हुए मनोजजी भी बोल पड़े - ' भाई कुछ भी हो मैं धर्म की निंदा नहीं सुन सकता। धर्म की निंदा सुनना भी धर्म के विरुद्ध आचरण करना है। '       तभी हमदम जी बोल पड़े थे - ' मान्यवर मनोज जी !मैं आप की भावनाओं की कदर करता हूँ किन्तु सच पूछिये तो आप की ही तरह और लोगों की भी मानसिकता बन गई है जिसका लाभ ये सफेद-पोश नेता उठा रहे हैं और भेंड़ बकरियों की तरह जब जी चाहा आप को हमको हलाल कर , उसके    खून से राजनीति की चादर का कलेवर बदल ले रहे हैं। धर्म स्वर्ग का रास्ता जरूर प्रशस्त करता है किन्तु सत्य तो यह है कि इस धर्म ने नरक    मचा रखा है , नरक । आज देश में जो कुछ हो रहा है सब धर्म के पीछे , हिन...