धर्म ( कहानी )
धर्म ( कहानी )
अभी-अभी परसों की बात है, अरविन्द जी पूरे जोर -शोर से धर्म
की वकालत किये जा रहे थे तभी हमदम जी आ खड़े हुए थे, और हम लोगों ने उन्हें बाइज्जत
कुर्सी पर बैठा लिया था, वे भी पूरे मनोयोग से हम लोगों की बातों में मशगूल हो गये थे, किन्तु उनके धैर्य का बाँँध उस समय
टूट गया जब अरविन्द जी की हाँ में हाँ मिलाते हुए मनोजजी भी बोल पड़े - 'भाई कुछ भी हो मैं धर्म की निंदा
नहीं सुन सकता। धर्म की निंदा सुनना भी धर्म के विरुद्ध आचरण करना है।'
तभी हमदम
जी बोल पड़े थे -'मान्यवर
मनोज जी !मैं आप की भावनाओं की कदर करता हूँ किन्तु सच पूछिये तो आप की ही तरह और
लोगों की भी मानसिकता बन गई है जिसका लाभ ये सफेद-पोश नेता उठा रहे हैं और भेंड़
बकरियों की तरह जब जी चाहा आप को हमको हलाल कर, उसके खून से राजनीति की चादर का कलेवर
बदल ले रहे हैं। धर्म स्वर्ग का रास्ता जरूर प्रशस्त करता है किन्तु सत्य तो यह है
कि इस धर्म ने नरक मचा रखा है, नरक । आज देश में जो कुछ हो रहा
है सब धर्म के पीछे ,हिन्दू
मुसलमान के दंगे धर्म के पीछे, मंदिर मस्जिद के झगड़े धर्म के पीछे, बार-बार का असमय चुनाव धर्म के
पीछे ,देश का बँटवारा हुआ वह भी धर्म के पीछे, जगह-जगह ईशाई मिशनरियों का खुलना और उन्हें प्रश्रय देना यह सब
धर्म की ही आड़ में हो रहा है। सारे राजनीतिज्ञ किसी न किसी को धर्म का मोहरा बनाकर अपनी राजनीति
की रोटी सेंक रहे हैं। मलिन वस्तियों में, आदिवासी क्षेत्रों में आप को जो
निःशुल्क सेवायें प्राप्त हो रही हैं , या जरूरत से ज्यादे आर्थिक लाभ किसी धर्म, पंथ, सम्प्रदाय विशेष के माध्यम से मिल
रहा है वह धर्म का असली स्वरूप नहीं है। आज धर्म की स्थिति ठीक हाथी के दाँँत जैसी हो गयी है। अब तो उपासना स्थलों को सामरिक स्थल व कुत्सित मनोभावों की भावनाओं
को पूर्णता की ओर अग्रसर करने का साधन बनाया जा रहा है।'
तभी मिश्रा जी बोल पड़े -'आप लोगों ने धर्म की चर्चा छेड़कर मुझे भी धर्मसंकट में डाल दिया। हमको तो लगता है कि धर्म की
परिभाषा ही बदल गयी है ।बेटा मनोज
! धर्म यह नहीं है ,जो देख रहे
हो। धर्म एक दूसरे से जोड़ता है तोड़ता नहीं है। '
हमदम जी ने बीच में ही उनकी बात को लोकते हुए कहा -'आप एकदम ठीक कह रहे हैं मिश्रा जी, धर्म
हिंसा नहीं सिखाता ,धर्म एक दूसरे
के उपासना स्थल पर अनधिकृत कब्जा कर बर्चस्व दिखाने या वहाँँ तोड़-फोड़ करने या उसे
अपवित्र करने का आदेश नहीं देता है। धर्म समभाव सिखाता है ,धर्म एक दूसरे का आदर करना सिखाता
है, अहिंसा का ही दूसरा नाम धर्म है ,और ये बातें सभी धर्मग्रंथों में
लिखी हैं चाहे वह नानक का गुरु- ग्रंथ हो या पैगंबर का कुरान अथवा हमारे ऋषियों का
उपनिषद या फिर यीशू की बाइबिल, सभी अहिंसा के पक्षधर हैं, फिर भी सारे धर्मावलम्बी आपस में लड़ते-झगड़ते
रहते हैं, और जिद्द ठानकर हमको आपको आपस मेंं लड़ाते रहते हैं। '
मिश्रा जी पुनः बोल पड़े -' भाई हमदम जी ! यही तो इस देश का
दुर्भाग्य है कि प्रत्येक व्यक्ति समीक्षा नहीं करता बल्कि लकीर का फकीर बनकर इन नेताओं व पाखंडी
धर्मगुरुओं की आवाज पर मरने –कटने को तैयार हो जाता है। '
'आज धर्म की महिमा का गुणगान करके
राजनीतिज्ञ हों या धर्मगुरु या फिर छद्मवेषी सब के सब धर्म की आड़ में
अपनी-अपनी झोली भर रहे हैं, अपने स्वार्थ की पूर्ति कर रहे हैं ,या यों कहिये की लंबा-चौड़ा बोर्ड लगाकर
मठ मंदिरों में राजसुख भोग रहे हैं। आये दिन अखबारों में बहुत कुछ
अकथ्य घटनाएं प्रकाशित होती रहतीं हैं ,फिर भी धर्मभीरु लोग शिकार होते
रहते हैं। आप ने कभी किसी नेता या धर्मगुरु को शर्म के लिए शहीद होते सुना है ? नहीं, नहीं सुने होंगे, क्योंकि उनका लक्ष्य भावनाओं की
चिंगारी से आग का प्राकट्य कर भोली भाली धर्मभीरु जनता को लकड़ी के रूप में
प्रयुक्त कर धर्म की भठ्ठी में झोंककर अपने स्वार्थ की रोटी सेंकना है। इसलिए यह सब कब तक
चलता रहेगा कुछ नहीं कहा जा सकता। आप सब ने दीपक को देखा है न ?वह चाहे तेल का हो या घी का स्वयं जलता है तब दूसरों के
लिए प्रकाश की व्यवस्था करता है परन्तु यहाँँ सब कुछ उलटा-पुलटा है ,एकदम उलटा।'
एक लम्बी साँस लेकर पुनः बोलने लगे- 'फिर हम कहते हैं कि मानव धर्म से बढ़कर भी कोई दूसरा धर्म है
क्या ?,जिस दिन
मनुष्य मनुष्य की पूजा करने लगेगा, एक दूसरे का दुःख दर्द समझने लगेगा उसी दिन यह धरती स्वर्ग हो जायेगी स्वर्ग। रही धर्म की बात तो धर्म तो सचमुच बड़ी ऊँँची चीज है -'धर्मो रक्षति रक्षितः 'धर्म के वगैर तो हम एक कदम भी
नहीं चल सकते, धर्म के अभाव में हम क्या हमारा पूरा समाज ही बिखर जाएगा।
आज हमारे समाज या घर परिवार में जो भी संस्कार या लाज-लिहाज बचा हुआ है, या सुरक्षित है वह सिर्फ धर्म के
नाते , इसीलिए कहा है कि -'यतो धर्मस्ततो जयः ''। क्या विडम्बना है हमारे समाज की एकांत
कमरे में जब हम अपनी बहन बेटी बुवा के संग होते हैं तो हमारे मन में किसी प्रकार
का विकार नहीं आता ,परन्तु
वहीं कोई परायी कन्या या कोई महिला होती है तो हम कर्मणा भले ही पाप से वंचित होते हैं
किन्तु मनसा और कभी - कभी वाचा पाप तो कर ही बैठते हैं। धर्म अकेले में भी हमारा मार्गदर्शन करता है। 'धर्म ही है जिसके कारण मुसलमान भी निकाह करते वक्त दूध का बराव करते हैं। धर्म ही है जब हम किसी
पराई कन्या या किसी मुँहबोली बहन से एक मामूली कच्चा धागा हाथ में बँधवा लेते हैं तो उसकी रक्षा
में अपना बलिदान तक कर डालते हैं। इतना ही नहीं अपने बड़े बुजुर्गों का जो सम्मान
करते हैं वह भी धर्म ही है , जिसका नमक
खाते हैं उसके प्रति वफादार बने रहने का प्रयत्न करते हैं यह भी धर्म ही है। धर्म काफी विस्तृत और अत्यंत ही कठिन है।' यह कहते - कहते उनकी आँखें छलछला आयीं।
यह सुन पाकर हमदम जी ने कहा -'आदमी को इतना भावुक भी नहीं होना
चाहिए। आदमी भावुकता में दिल का मरीज हो जाता है ,फिर आप तो हम सबमें सबसे बुजुर्ग
हैं ,समाज और
दुनिया को काफी निकट से देखे हैं , भला आप को हम लोग क्या समझायें,,,,,.बीच में ही बात काटते हुए मिश्रा
जी पुनः बोल पड़े -
'हमदम जी ! मुझे भी धर्म ने ही बाँध रखा है समझ नहीं पा रहा हूँ कि उस धर्म से कैसे निकलूँ ,निकल तो क्या पाऊँँगा यदि अपने धर्म का
निर्वाह कर सकूँ तो यह मेरे लिये बहुत बड़ी बात होगी , ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि हे नाथ !मुझे ऐसा बल दो,ऐसी क्षमता दो कि तुम्हारे द्वारा बाँँधे बंधन के दायित्व का निर्वाह कर सकूँ।'
'कैसा दायित्व मिश्रा जी ?'-हमदम जी ने आश्चर्य भरे शब्दों
में पूछा।
मिश्रा जी ने थोड़ा रुककर कहना
शुरू किया -'हमदम जी उन
दिनों की बात है जब मैं नयी -नयी नौकरी पाया था। उसी समय गले में फोड़े से परेशान
होकर डाक्टर को दिखाने पटना आ पहुँँचा। डाक्टर ने बताया कि रोग अंदर ही अंदर इतना बढ़
गया है कि तत्काल आपरेशन न हुआ तो यह रोग आप के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। और मैं
बिना कुछ सोचे बिचारे वहाँँ अस्पतालमें भरती हो गया।
हमदम जी ! आज तो प्रभु की कृपा से योग्य पुत्र के चलते मुझे दुनिया
की प्रत्येक सुख सुविधा उपलब्ध है किन्तु उस समय मैं एक अत्यंत सामान्य परिवार का
सदस्य था और सिर पर जिम्मेदारियों का बहुत बड़ा बोझ था, गृहस्थी एकदम कच्ची थी, बूढ़े माता-पिता और घर में मेरी
पत्नी, गोंद में छोटे-छोटे दो अबोध बच्चे , अस्पताल में सेवा करने वाला कोई
नहीं ,पर सच है
कि ईश्वर के बड़े लम्बे हाथ हैं। किसी के मुख से सुना था कि '' जब विपदा आती है तो उसके पीछे प्रभु
की करुणा भी दौड़ी-दौड़ी आती है, सो उसी अस्पताल में एक नर्स जो
अपनी ट्रेनिंग पूरी कर रही थी परन्तु स्वभाव में अन्य सभी लड़कियों से भिन्न थी, बोलती थी तो लगता मानों वाणी में
मिश्री घुली हुई हो ,,शरीर छूती
तो लगता कोई रूई का फाहा तन से छू गया हो और चेहरे की सौम्यता तो सचमुच देव मंदिर के किसी भव्य मूर्ति जैसी। देखते ही कोई भी उसके प्रति श्रद्धाभिभूत हो जाता । उसके निकट आते ही लगता
जैसे शरीर का आधा रोग उसे देखते ही दूर हो गया। '
फिर कहने लगे- 'मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है, मैं स्वस्थ हो चला था । दो-तीन
दिन बाद अस्पताल से छुट्टी होनी थी कि रक्षाबंधन का पावन पर्व आ पड़ा था,
प्राय सभी एक
रोगियों के हाथों में राखियाँँ बँधी चमचमा रहीं थीं। कुछ की डाक से आयी थी तो कुछ
स्थानीय लोगों की बहनें आकर राखियाँँ बाँध गयीं थी। मैं अपने भाग्य पर मन ही मन सोच
रहा था कि कितना बड़ा अभागा हूँ जो मेरी अपनी कोई सहोदर बहन नहीं है ,मेरी अपनी बहन होती तो मेरे लिये भी राखी अवश्य
भेजी होती या आज के दिन आकर बाँध गई होती। इसी सोच में डूब उतरा रहा था कि तभी वह
मेरे कमरे में अपनी ड्यूटी के समय से हाजिर हो गई और रोज की भाँति सभी मरीजों का हाल-चाल लेती, सभी को एक-एक
लड्डू खिलाती मेरे बेड तक आ पहुँँची थी और मेरी सूनी कलाई को देखते ही पूछ बैठी -' क्यों भाई मिश्रा जी !तुम्हारे घर
से राखी नहीं आई क्या ? लगता है कहीं डाक विभाग में फँस गई '
उसकी बातें सुनकर मेरी आँखे गंगा यमुना हो गईँ थीं, मैंने कहा -'नहीं सिस्टर मेरी अपनी कोई बहन
नहीं है '- और मेरा
गला भर आया ,आगे कुछ
बोलना चाहकर भी नहीं बोल पाया।
तभी उसने कहा –‘बड़े
झूठे हो भाई ! अभी –अभी तुमने मुझे सिस्टर कहा है, और महीने भर से कहते आ रहे हो
, मैं तुम्हारे सामने खड़ी भी हूँ फिर भी कह रहे हो कि मेरी कोई बहन नहीं है'
फिर अपनी दाहिनी जेब से रेशमी धागे की राखी और
बायीं जेब से रोली की डिब्बी निकाल कर माथे पर लगाते हुए बोल पड़ी - ‘बढाओ तो कलाई अपनी ,और मैं सचमुच अपनी दाहिनी
कलाई बढ़ा दिया था तब उसने रेशमी धागे बाँँधते हुए मेरे सामने के टेबिल पर रखी
पिटारी में से एक लड्डू उठाकर मेरे मुँँह में ठूँँस दी थी।
मैं
किं कर्तव्य विमूढ़ सा बना हुआ इतना ही पूछ पाया –‘बहन तुम्हे कौन सा उपहार दूँ ? मैं
समझ नहीं पा रहा हूँ। '
उसने कहा –"अरे ! अरे
!! ये क्या कह रहे हो ? सुना है तुम अध्यापक हो ,तुम्हे भी समझाना पड़ेगा, अरे एक
बहन के लिए भाई के स्वास्थ्य से बढ़कर और
दूसरा उपहार क्या हो सकता है । तुम यहाँ से स्वस्थ होकर अपने घर परिवार में खुशी –खुशी
जाओ हमारे लिए इससे बड़ा उपहार क्या होगा ।"
' बंधु
! हमदम जी, मैं स्वस्थ होकर वहाँँ से घर चला आया और तीन महीने में तीन बार चेक अप
कराने भी वहाँ गया । जब जब गया तब तब उससे मिलता रहा किन्तु स्वस्थ होते ही अपनी गृहस्थी में उलझ गया । एक वर्ष बाद वही रक्षाबंधन का पावन पर्व फिर से आया तो
मैंने अपनी पत्नी से कहा –‘सुनती हो तुम्हारी धर्म की ननद के पास जाना चाह रहा हूँ
राखी बँधवाने क्या कह रही हो ?'
पत्नी ने कहा – ‘आती हूँ ’और बगल के
कमरे में चली गई, थोड़ी देर बाद लौटी तो उसके लिए सुंदर सी साड़ी और अन्य उपयोगी
सामान दुसूती के कढ़ाई किये हुए झोले में रखकर ले आई और बोली कि –‘अभी तो आप की बहन के लिए
मैं अपनी तरफ से कुछ भी नहीं दे पा रही हूँ पर जब उन्हें सूरज के मुंडन में बुलाऊँगी
तो ऐसा कुछ अवश्य दूँँगी जिसे वे जीवन भर याद करेंगी।'
मैं अपनी पत्नी के मनोभावों को सुनकर मन
ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ। पटना आकर उसके लिए एक चिकन का सूट खरीदा, सोचा पिछले वर्ष
खाली हाथ राखी बँधवाया था सो इस बार उसे दोनों उपहार दे दूँगा पर जब मेडिकल हास्टल
पहुँँचा तो पता चला कि वह ट्रेनिंग छोडकर चली गई।
उस दिन
दुखित होकर निराश मन लिए लौट आया। घर आकर उसके बताये पते पर उसके पिता जी को
चिट्ठी भेजा तो उत्तर आया –‘बड़े दुःख के साथ लिखना पड़ रहा है कि आप की बहन कुछ
दिनों पूर्व एक एक्सीडेंट में दिवंगत हो गई ।'
मित्र हमदम जी ! उस पत्र से मैं बहुत
मर्माहत हुआ ,जब भी राखी का पावन पर्व आता एक बार मुझे रुला जाता, और जब भी किसी
गले के रोगी को देखता तो अस्पताल के वे दिन और उसके सेवा भाव स्मृतियों में आकर रुला जाते। इस
तरह दिन बीतते गये, बीतते गये और एक लंबा समय बीत गया। मेरे दोनों बच्चे क्लाश वन
अफसर हो गये, जहाँँ–जहाँँ वे स्थानान्तरित होकर जाते मुझे भी उनके साथ जाने का अवसर मिलता, उसी
क्रम में एक बार उस नर्स के गृह जनपद जाने का अवसर आया, उस शहर में पहुँचकर मुझे बेचैनी
सी होने लगी, मन में भाव आया उसके घर वालों से मिल लूँ, उसके माता–पिता, भाई–भतीजे
कोई तो होंगे जो यह बता पायेंगे कि आखिर उसकी मौत कैसे, किस दुर्घटना में हुई, सो
पता लगाने उसके घर जा पहुँँचा।
उसके पारिवारिक सदस्य के नाम पर उसका
भतीजा मिला, पता चला कि इस दुनिया में उसके माँ बाप भाई अब कोई नहीं रहे।
उसके
भतीजे से मैंने पूछा –‘अच्छा यह बाताओ कि मरियम नाम की तुम्हारी कोई बुआ थी उन्हें
जानते हो ?’
भतीजे
ने कहा –‘ हाँ –हाँ जानता हूँ, बुआ हैं तो क्यों नहीं जानूँँगा, क्या बात है ? आप
कौन हैं ?'
मैंने
अपना परिचय न देकर पुनः पूछा –‘तो फिर बताओ कि उनकी मौत कैसे हुई ?'
वह
बौखला गया, पूछा –‘आप कौन हैं और क्या कह रहे हैं। जीवित व्यक्ति को मृत बता रहे
हैं।'
मैंने
सोचा कहीं गलत जगह तो नहीं आ पहुँँचा, फिर अचरज भरे स्वर में पूछा –‘तो बताओ न फिर,
कि वे कहाँँ हैं। रही बात मेरी तो सिर्फ यह जान लो कि उनके द्वारा अस्पताल में कभी
मुझे जीवन दान मिला था।'
तब उसने बताया कि -'वे पटना में रहती हैं, किन्तु
हम लोग अब उन्हें सीमा बुआ के नाम से जानते हैं। उन्होंने हिन्दू धर्म के एक
व्यक्ति से प्रेम विवाह कर लिया था इस लिए हम लोग उनसे अब कोई मतलब नहीं रखते। न
उनके पास कोई जाता आता है और न उन्हें कोई बुलाता ही है। हम लोग शुद्ध ईशाई ठहरे,
उन्होंने एक बार भी इसका ख़याल नहीं किया कि गाड फॉदर क्या सोचेंगे, अतः प्रभु ईशू
की प्रसन्नता के लिए हमलोग उनसे किसी प्रकार का रिश्ता–नाता नहीं रखते। वैसे यह समझिये की 'वे' हमारे लिए मर चुकी हैं। हम लोगों के लिए क्या एक तरह से वे अपने जीवन में भी
मृत ही हैं। अच्छा ही हुआ उनके साथ भी जैसा कृत्य उन्होंने किया वैसा ही भोग भी रही हैं। एक दम
कुलकलंकिनी निकली, कुलकलंकिनी, दादाजी तो अपने जीते जी नहीं ही बुलाए, मरते-मरते
हम लोगों से भी कह गये कि उसे अपने घर में कभी प्रवेश मत देना ।'
मैं
सोचने लगा उसने ऐसा कौन सा गलत कार्य किया।जिस कृत्य का इतना बड़ा दण्ड, इतनी भारी
सजा, यह बात मेरे समझ में नहीं आ रही । हम सबसे पहले इंंसान हैं बाद में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख
ईशाई या और कुछ। सब एक ही अन्न खाते हैं, सबका खून एक ही जैसा लाल है, सबके
गर्भाधान से लेकर पैदा होने तक की
प्रक्रिया एक जैसी ही है अतः कैसी जात और कैसा धर्म ? फिर मैंने कहा ‘अरे भाई ! सबसे
बड़ा धर्म तो मानव धर्म है, मानव का मानव के प्रति प्रेम सौहार्द्र हो, सभी एक दूसरे के
धर्म की मर्यादा करें , यही सबसे बड़ा धर्म है’। और फिर इस चिन्तन के बाद पूछ बैठा
–‘अच्छा उनका पता बता सकते हो ?’
उसने
अन्य मनस्क भाव से मानों बला समझकर टालने के उद्देश्य से, पता लिखकर मुझे थमा दिया।
प्रफुल्लित
मन लिए मैं दूसरे सप्ताह उसके दिये हुए पते पर जा पहुँँचा। समय की गति ने हम दोनों
के सकल–सूरत में आमूल–चूल परिवर्तन कर दिया था, जब मैं ही उसे नहीं पहचान पा रहा
था तो भला वह कैसे मुझे पहचान पाती। मैंने काफी कुछ उसे याद दिलाया तो उसके दिमाग
में कुछ–कुछ धुँँधली सी स्मृति आई। तब उसने कहा -; हाँ हाँ, एक लड़का दवा कराने आया
था,’
फिर रुककर बोली –‘उस दो साल की ट्रेनिंग के दौरान न जाने
कितने मरीज आये और गये भला कैसे याद रहेगा।’ और चुप लगा गई।
मैं सोचता रहा -कहाँ से अपनी बात प्रारम्भ
करूँ ? क्या पूछूँ, क्या कहूँ ? किसी बात का बुरा न मान जाय।
तभी वह पूछ बैठी –‘कैसे आना हुआ ?’
मैंने बड़ी हिम्मत से कहा –‘आप के
गृह जनपद में इस समय रह रहा हूँ, आप का पता मिल गया था, यहाँ पटना सचिवालय में
किसी कार्यवश आया था सोचा आप से भी मिलता चलूँ।
बातें आगे बढ़ी, बातों के ही दौरान मैंने पूछा
–‘अच्छा मरियम यह बताओ कि तुमने ट्रेनिंग भी पूरी नहीं की और अपना घर बसा ली, माँ-बाप
सबसे रिश्ता तोड़ ली, आखिर ऐसा क्यों ? मुझे
अच्छी तरह याद है तुम दूसरों को सुझाव देती थी, फिर तुमसे इतनी बड़ी गलती कैसे हो
गई।?'
उसने
बड़े ही दुखित स्वर में भावुक होकर कहा –‘भैया ! पहले तो आप भूल जाइए कि आप के
सामने मरियम खड़ी है, मुझे तो उस नाम और धर्म दोनों से घृणा हो गई है, अब अगर आप
पुकारना ही चाहें तो सीमा नाम से मुझे पुकार सकते हैं।'
फिर थोड़ा रुककर बोली –‘वैसे आप ने
जब पूछ ही लिया है तो सुन लीजिये – ‘मैं अपने समाज, माँ – बाप व सम्पूर्ण मायके
वालों की दृष्टि में आचरणहीन व कुलकलंकिनी हूँ, पर मेरी मजबूरी को समझने का किसी
ने भी प्रयास नहीं किया, सबने यही समझा कि आज के दौर में प्यार जो फैशन का रूप ले
लिया है अंतरजातीय, और अन्तर्धार्मिक विवाह करने की परम्परा जो बन गई है अपने देश में, शायद
मैंने भी वैसे ही 'लव मैरेज' कर लिया है। इसलिए मैं सभी की निगाहों से गिर गई। माँ
बाप रहते हुए भी अनाथों की तरह हो गई। मेरे सुख दुःख में कोई भी खुशी व्यक्त करने
वाला या आँँसू बहाने वाला नहीं रहा।'
थोड़ा रुककर एक गहरी साँँस लेते हुए बोली- ‘भैया ! आपने तो
अस्पताल के दिनों में मुझे अत्यंत निकट से देखा था कि चरित्र के मामले में कितनी
कमजोर या मजबूत थी ? मैं कितनी सुंदर या असुन्दर थी ? हाँ यह जरूर कहूँगी कि मैंने
अच्छा किया या बुरा, यह तो मैं नहीं जानती पर यह तन अर्पित हुआ तो सिर्फ को ही। चाहती
तो मैं भी अपनी नजरों में गिरकर, अपने माँ बाप की दृष्टि में अच्छी बनी रहती। और जीवन
में कई एक डाक्टरों, वार्ड ब्वायों या फिर दादा किस्म के लोगों को संतुष्ट कर
पातिव्रत्य की झूठी चादर ओढ़कर अपने चेहरे पर बेहया हँसी व मुस्कान बनाये रहती, किन्तु
मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिसका दण्ड भोग रही हूँ। किन्तु मेरा अंतर्मन मुझे कभी
नहीं कोसता, अपने मन की आँखों में आज भी मैं गिरी नहीं हूँ, मेरा चरित्र उस कंचन की
तरह है जो जितना ही आग की दहकती भट्ठी में तपता है निखरता जाता है।'
ओठों पर जीभ फिराते हुये फिर कहने लगी-'आप तो जानते हैं कि आज की दुनिया में नर्सों को लोग एक अलग दृष्टि से ही
देखते हैं मानों वह औरत न होकर कोई खिलौना हो, जिससे जो चाहे जब चाहे खेल ले, उसी क्रम
में मेरे ट्रेनिंग पीरियड में कई एक लोग उसी गंदी भावना को मन में बसाये मेरे पीछे पड़े हुए थे। और मेरा जीना मुहाल सा हो गया था। एक–एक दिन प्रभु की कृपा से इज्जत बचाते हुए बीत
रहे थे कि उन्हीं लोगों में यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ के नेता की दृष्टि मुझपर आ टिकी जो दबंग किस्म के थे उन्होंने मेरे
सामने एक प्रस्ताव रखा, मैं सोच नहीं पा रही थी कि किसे क्या कहूँ, एकाध सहेलियों
से पूछी तो उन सबने यही कहा कि कर दे समर्पण, नेता सब पर नहीं मरते, तेरा अस्पताल में
रुतवा रहेगा रुतवा, पर मेरा अन्तःकरण स्वीकार नहीं कर पा रहा था, सोची घर वालों से कहूँ, पर
उसका भी कोई हल न निकलना था क्यों कि पिताजी का कहना था कि चाहे जैसे भी ट्रेनिंग
पूरी करनी है, इसलिए मैंने अपने विवेक से निर्भीकता पूर्वक उस छात्र नेता से
प्रश्न किया –‘क्या आप मुझे वासनापूर्ति का साधन मानते हैं, या और कुछ ?'
वे भड़क गए, बोले –‘कहना क्या
चाहती हो ?’
मैंने कहा –‘मैं आप से कह भी क्या सकती हूँ ,किन्तु जिस वस्तु की आप
अपेक्षा कर रहे हैं वह तो आप को सिर्फ अपनी पत्नी से ही उम्मीद करनी चाहिए और मैं आप की
पत्नी हूँ नहीं ,और न होने वाली हूँ।’
बोले
–‘तब ?’
मैंने
कहा –‘तब क्या, यदि आप अपने शरीर की भूख मिटाना ही चाह रहे हैं तो चलिए एकांत स्थल
या जंगल में पहले मेरा गला दबाकर हत्या कर दीजिए फिर अपनी भूख मिटा लीजिएगा, क्योंकि
मैं जानती हूँ कि आप से द्रोह करके मैं बच नहीं सकती। या फिर दूसरा विकल्प यह है कि इस विद्या मंदिर
की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की सौगन्ध खाकर कहिये कि ‘आजन्म एक जीवन साथी की
तरह मुझे सम्मानित जीवन देंगे, और मेरे गर्भ से पैदा हुई संतान को पिता की जगह
अपना नाम। फिर मैं तैयार हूँ’।
भैया !इस
प्रस्ताव को रखने के बाद मैं जान रही थी कि आज मेरे जीवन का अंतिम दिन है, क्यों
कि वे खूंखार किस्म के व्यक्ति थे, किन्तु परिणाम मेरी सोच के ठीक विपरीत निकला।
उन्होंने मेरी
बात सुनने के बाद कहा कि –‘मरियम ! तुमने तो मेरी आत्मा को हिला के रख दिया, आज
मैं तुम्हारे सामने हार गया हूँ। तुम्हारे चरित्र
के पर्वत ने तो मेरे अंदर की नदी की धार को ही बदल दिया। इसलिये मेरे जीवन की सच्चाई को सुनो– मैं विवाहित हूँ, मेरी
पत्नी गाँव में रहती है, और मैं यदुवंशी हूँ। तुम यदि अपना धर्म बदल कर मेरे साथ रहना चाहो तो मैं
अपने कुल आराध्य भगवान श्रीकृष्ण की सौगंध खाकर कहता हूँ कि आजन्म तुम्हें पत्नी की
तरह रक्खूँगा, खाते पीते घर का हूँ, कोई कमी नहीं होने दूँगा, पर शर्त यह है कि
तुम्हें नर्स की ट्रेनिंग से विमुख होना पड़ेगा, और भविष्य में भी नौकरी नहीं
करोगी, क्योंकि औरत घर की इज्जत होती है इसी लिए उसके लिए सीमा बनायी गई है, शायद
तुम भी घर में होती तो तुम्हारे सामने यह प्रस्ताव मैं न रख पाता। इसलिए मरियम से सीमा
बन जाओ और बचन दो कि हमारे हिन्दू धर्म के देवी देवताओं का आदर करोगी, अन्यथा मैं
तुम्हारे साथ कुछ भी कर सकता हूँ और तुम मेरा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकोगी, न ही मुझसे
अपना चरित्र बचा सकोगी’
तब मैंने कहा
–‘क्या ऐसा कर लेने मात्र से फिर आप का दिल किसी और नर्स या अन्य नारी पर नहीं
उतरेगा, या उतरेगा तो उसे भी ऐसा ही आश्वासन देंगे ?'
उन्होंने कहा –' तुम्हें इस प्रकार मुझसे प्रश्न करते भय
नहीं लग रहा ?'
मैंने कहा – ‘कैसा भय ? भय भी कहीं अपने पति से लगता है ?,
यदि आप ने स्वीकारा तो भी पति हुए, और
कहीं अपनी भूख मिटाकर त्याग दिए तो भी, क्योंकि वही मेरी जिन्दगी का आखरी दिन होगा। भारतीय नारी तो जीवन में एक ही बार किसी का वरण करती है
चाहे इच्छा से या अनिच्छा से और वही उसका पति होता है, ईशाई धर्म में पैदा हुई तो
क्या हुआ, हूँ तो भारतीय।’
भैया, इतना
सुनने के बाद वे मुझे खींचकर गले से लगा लिये और बोले –‘यह आश्वासन नहीं एक यदुवंशी का
वचन है जो सिर्फ तुम्हें दे रहा हूँ, और हाँ
अब फिर किसी अन्य नारी पर मेरा दिल न उतरे इसका भरपूर प्रयास करूँँगा।
तब मैंने कहा – ‘तो फिर एक वचन और दीजिए की अपनी व्याहता पत्नी को जो मेरी बड़ी बहन हुईं, मेरे कारण भूलकर भी कोई कष्ट नहीं देंगे और न
ही उनका अपमान करेंगे ?'
उन्होंने कहा
–‘यह तुम कह रही हो, एक नारी होकर ?'
मैंने कहा-
‘हाँ, मैं कह रही हूँ। इसलिए कि जान बूझ कर एक नारी का
अधिकार बांँटने जा रही हूँ, वे तो मेरी
मजबूरी को नहीं जानती पर आप तो जान रहे हैं न ? रही बात मेरी तो मैं उनके विषय में जानने के
बाद अपना निर्णय आप को दे रही हूँ।'
यह सब सुनने
के बाद उन्होंने वचन दिया कि ऐसा ही करूँगा, दूसरे ही दिन संयोग से आश्विन नवरात्र
का प्रथम दिन था ट्रेनिंग छुड़वाकर देवीजी के मंदिर ले गए और माँ भगवती के सामने सिंदूर
पहना दिए।
भैय्या,
मैंने नर्सों की इस अकथ्य मजबूरी को बताने का दुस्साहस किया, उससे नर्स जाति पर एक
प्रश्न चिन्ह सा लग जा रहा है। बहुत सी मेरी
बहनें जो इस बाने से जुटी हैं वे मुझे गाली भी देंगी किन्तु यह कटुसत्य है, इसका
यह भी मतलब नहीं कि वे सब पथभ्रष्ट होती हैं, मैं तो सिर्फ यह कहना चाह रही थी कि
कुछ तो उस माहौल में अपने को न चाहते हुए भी ढाल लेती हैं। और कुछ के ऊपर कोई असर नहीं पड़ता। बत्तीस दाँँतों के बीच रहकर भी अपने को सुरक्षित रख लेती
हैं जीभ की तरह। किन्तु यह जो समाज है, उसकी अपनी अलग दृष्टि है जिसकी
वजह से उसे अच्छे भी बुरे दिखाई देते हैं । हाँ, मैं यह भी
कहना चाहूँगी कि जो बहनें इस सेवा में लगी हुई हैं वे बहुत महान हैं जो अपने को आरोपित महसूस करते हुए भी सेवारत हैं
अन्यथा यह सबके ऊपर हँसने वाला समाज कब का रोगी होकर समाप्त हो गया होता।
और भैया इस
तरह उनके साथ दाम्पत्य धर्म का निर्वाह करते हुए पाँँच संताने हुईं तीन बेटियाँ और
दो बेटे, अभी कच्ची गृहस्थी ही थी कि उनकी कीर्ति और वकालत का लोहा मानने वाले कुछ
गुंडे, एक बहुत बड़े अपराधी को फाँँसी की सजा दिलवाने के कारण उनकी हत्या कर दिए। वे अपराधी उन्हें पैसों से खरीदना चाहते थे, किन्तु वे एक
असहाय नारी की ओर से वकालत करते हुये उसके पति के हत्यारे को फाँँसी पर लटकवा दिए थे। परिणामत: उस नामी गुंडे का लड़का जो स्वत: भी नामी गुंडा
है उनकी हत्या करवा दिया। जिसकी हत्या उसके बाप ने की थी , उसका दोष सिर्फ इतना था कि उसने अपनी सुंदर पत्नी का चरित्र
लुटने से बचाया था। यानी उस गुंडे का प्रतिरोध किया था।
इस तरह भैया, आज अठारह साल से धर्म के बीच फँसी
हुई हूँ, मायके वाले मुझे पहले ही त्याग
दिये थे उनके जीते जी, जो आप को पहले ही बता चुकी हूँ।
उनके निधन के बाद ससुराल वाले भी यह कहकर त्याग
दिये कि -"तुम्हें ब्याह कर थोड़े लाये थे ? फिर तुम तो ईशाई थी, अब अपने बच्चों के
साथ जरो या मरो, हम लोग हिन्दू हैं, हम
लोगों से कोई मतलब नहीं।"
भाई हमदम जी
!उस दिन मैं पटना से लौटने की जल्दी में था और उसकी बातों को सुनकर बोझिल मन लिए चुप
चाप लौट आया था, यह कहकर कि - ‘अच्छा बहन मैं तुमसे जल्द ही पुन: मिलूँँगा। किन्तु मन कई दिनों से इस उहापोह में है कि उसने तो अस्पताल
के दिनों में अपने धर्म का निर्वाह किया था और धर्म के धागे से मुझे बाँध भी ली थी , पर
मैं उसके लिए क्या करूँ ? इसी धर्म संकट में पड़ा हूँ।
कल रात पत्नी ने मेरी अन्तर्व्यथा को दूर करने के लिए सुझाव
दिया कि –‘ संभव हो तो उनके बेटे बेटियों के भविष्य को सँवारने में सहयोग कीजिए । ‘मुझे उसकी बात जँच गई है। मैंने दृढ संकल्प कर लिया है कि अपने भ्रातृत्व धर्म का
अवश्य निर्वाह करूँँगा।'
तभी नौकर आकर बोल गया – ‘सर ! माँ जी भोजन करने के लिए बुला रही हैं, थाली लगी हुई
है, और वे उठकर खड़े हो गये , उनके साथ सभी लोग उठकर खड़े हो गये तथा बोल पड़े – ‘यही संसार है मिश्राजी क्या करियेगा, फिलहाल जाइए भोजन कर लीजिये।'
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