फटीचर - प्रथम भाग

फटीचर
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   खिड़की के किनारे बैठा जीवन विचारों में खोया - खोया सामने झूमते भागते वृक्षों व खेतों को देखता चला जा रहा था।गाड़ी की सीटी की आवाज सुनाई दी, गति धीमी होने लगी,और धीमी और धीमी फिर गाड़ी रुक गई।मेल-गाड़ी और यह छोटा सा स्टेशन।यहाँ गाड़ी का रुकना सभी को आश्चर्य में डाल रहा था।सहसा काला परिधान धारण किये हुये टी. टी.ने डिब्बे में प्रवेश किया 'लो यमदूत आ गया' जीवन के मुख से यूँ ही निकल पड़ा।
' टिकिट् टिकिट्।'
  दूसरे किनारे से चेक करता हुआ, वह चला आ रहा था।जीवन समझ नहीं पा रहा था, तभी शौचालय पर उसकी नजर गई और वह धीरे से खिसक कर उसी में घुस गया।
  और गाड़ी चल दी । - खट् खट्, टी.टी. ने दरवाजा ठोंका।
   'अरे साहब,कम से कम उसे टट्टी तो कर लेने दीजिये!-'किसी बूढ़े ने कहा।
    'आप समझते नहीं, यह बेईमान हमको छका रहा है।देखते हैं कब तक नहीं निकलता है।यहीं खड़ा रहूँगा मैं।आज इसे सबक सिखा के छोड़ूँगा।'
  'तुम क्या समझते हो तुम्हारे बाप का डिब्बा है?हमने भी पैसे दिये हैं।'
   'अबे ओ. जबान सम्हाल कर बोल, नहीं तो चलती गाड़ी से उठाकर फेंक दूँगा। - समझे ?'
   'अरे , यह क्या करते हो, यह क्या करते हो भाई?तुम लोग झगड़ा काहे को करते हो ?'
   'नहीं साहब, आप ही बताइये, मेरा क्या दोष है थोड़ा सा बगल होने को कहा तो ये साहब यों उखड़ गये जैसे पूरी बोगी ही रिजर्व करा लिये हों।'
    'क्यों, आप को तो अगले स्टेशन पर ही उतरना है न?तो थोड़ा बगल से हो जाइये न, दस मिनट का तो मामला है।' डिब्बे में आवाजें गूँज रही थीं कि धीरे धीरे गाड़ी जंक्शन पर आकर रुक गयी।
   'अरे भाई साहब!उधर देखिये, नहीं तो वह लड़का निकल भागेगा।'
   'बड़ा चालाक निकला साला! भाग गया कमीना कहीं का!'
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   ' यहाँ तो जिनके पास सामान रहता है उन्हीं को रहने दिया जाता है'  -धर्मशाला के मैनेजर ने कहा।
    जीवन चलने के लिये मुड़ा ही थाकि। -किसी अन्य ने पुकारा -'सुनो जरा ।'
     ' क्या बात है ?'
   'दो रुपये दे दो तो मैनेजर से कहकर रातभर ठहरने के लिये स्थान दिला दें।'
   'भाई साहब, मेरे पास तो कुल एक रूपये पैंतीस पैसे ही हैं। फिर आप को दो रूपये कहाँ से दूँ।'
   'अच्छा तो जितना है उतना ही दे दो।'
    'ना मैं नहीं दे सकता। वही तो मेरा सहारा है, दस पाँच पैसे की गुड़पट्टी खरीद कर पानी पी लेता हूँ।'
     'अच्छा तो एक रूपया दे दो।'
    भाई साहब, मुझपर मेहरबानी कर दीजिये, भला होगा आप का।'
   'अच्छा अच्छा रास्ता नापो अपना मुझे उपदेश देने चले आये हो।'
    दुकान से सटा छोटा सा लकड़ी का पल्ला देखा और वहीं डेरा डाल दिया। और मन ही मन कहने लगा - 'आखिरकार चाची को मुझसे इतनी कुढ़न क्यों है? काहे को जलन रखती हैं ? इसीलिये न कि मेरे माँ बाप नहीं हैं- 'अनाथ हूँ।'और फिर चाची के वे वाक्य याद आये - 'अपने नासपीटे मर गये , मेरे लिये आफत छोड़ गये ढाई सेर बैल की तरह चढ़ा लेता है और तोंद फुलाये घूमता है।'
    जीवन के मस्तिष्क में चलचित्र सा घूम गया वह दृश्य।उस दिन दलान में मवेशियों के लिये घास लेकर जब वह आया था तो चाची यही तो कह रही थीं चाचा से।
और फिर दूसरा दृश्य दिखा-
   'अरे शंकर,  ओ शंकर!'
  ' आया अम्मा।'
   'कब से कह रही हूँ  -  खोरे में मलाई रखी है उसे खा ले।सुनता ही नहीं है।अभी कहीं से वह टपक पड़ेगा।'
   'कौन टपक पड़ेगा, अम्मा ?'
   'अरे वही तोदूँ।'
   'तोदूँ , तोदूँ कौन अम्मा ?'
   'जीवना,जीवना ,अब समझे ?'
  ' तो क्या हुआ उसको भी थोड़ी सी मलाई दे देना।'
  'उसका बाप रख गया है न कमा के ,जो दे दूँगी।'
 ' अम्मा, तुम तो जरा सी बात पर बिगड़ जाती हो,आखिर वह भी तो मेरे जैसा ही है - क्या उसका मन नहीं करता ?'
   'बक बक मत कर, चुपचाप खा ले।'
    दिन निकल आया तो जीवन को रमेश की बात याद आयी और प्रोफेसर साहब के यहाँ जा पहुँचा।
    आगे बरामदे में ही प्रोफेसर साहब बैठे थे, निगाहें उनकी अखबार पर थीं।और सामने टेबिल पर चाय का प्याला सजा था।
  आहट पाकर प्रोफेसर साहब ने निगाहें उठायी तो सामने जीवन को खड़ा देखकर पूछ बैठे -' क्या बात है बेटे, कहाँ से आये हो ?'
   तब बड़े ही धीमे स्वर में जीवन ने उत्तर दिया - ' सर,आया तो जौनपुर से हूँ, बहुत गरीब हूँ और पढ़ने की प्रबल इच्छा है, मगर आय का कोई स्रोत नहीं है कि पढ़ सकूँ।यदि आप की सहायता से कोई ट्यूशन आदि मिल जाता तो, बड़ा नेक मानता।'
   ' कहाँ तक पढ़े हो?'   
   'बी.ए.भाग एक की परीक्षा इसी वर्ष उत्तीर्ण की है।'
   'अंग्रेजी पढ़ा सकते हो?'
   'जी हाँ, हिन्दी, अंग्रेजी, गणित सब पढ़ा लूँगा।'
    ' ये कौन है?' बरामदे में प्रवेश करते ही उनकी पत्नी ने पूछा।
    तब प्रोफेसर साहब ने स्वभाव वश हँसी के मूड में कहा- 'नहीं जानती?तुम्हारी जैसी ही किसी स्त्री का बेटा है।'
    'धत्!'
    'ओ हो !सही तो है, देखो न तुम भी गोरी हो  ,और ये भी गोरा है-'आखिर गोरी माँ की सन्तान गोरी ही तो होती है।'
   'आपको तो हमेशा मजाक की ही सूझी रहती है।'
   'मैं सोच रहा हूँ-अपने शर्मा जी हैं न ,वे एक ट्यूटर के लिये कह रहे थे, उनकी लड़की क्षमा हाईस्कूल में पढ़ रही है और उसकी अंग्रेजी काफी कमजोर है और यह लड़का ट्यूशन चाह रहा है, तो वहाँ इसे पढ़ाने के लिये लगाये दे रहा हूँ,क्यों कैसा रहेगा तुम्हारे विचार से ?'
    'मैं क्या कहूँ कैसा रहेगा, आप तो जिसकी भी दो मीठी बातें सुनते हैं विश्वास कर लेते हैं।घर का पता हो न द्वार का।'
   'अरे नहीं भाई, यह अपने गाँव के पास का ही रहने वाला है नाम गाँव सब बता रहा है फिर-----।'
   'ठीक है, वह तो मैं जानती हूँ कि आप अपनी वाली ही करेंगे फिर भी इतना बताये देती हूँ कि किसी दिन जो शर्मा जी उलाहना लेकर आये तो हमसे न कहियेगा।'
    'नहीं भाई, ऐसी बात न होगी। शरीफ लड़का है, कुछ चेहरा देखकर भी अन्दाज लग जाता है।'
   'चेहरे पर लिखा हुआ है क्या कि शरीफ ही है? हमें तो कोई चोर पाकेटमार लग रहा है देख नहीं रहे हैं, मार वार खाया है, कपड़े भी फट गये हैं, चेहरे पर बारह बजाये सबेरे - सबेरे जाने कहाँ से आ धमका! पता नहीं, दिन में आज खाना भी मयस्सर होगा या नहीं।'
    'तुम तो आसमान पर पाँव रखकर बात कर रही हो, आखिर बात क्या है?, तुम्हें हो क्या गया है ?'
   'मुझे क्या हो गया है, मैं नहीं जानती, लेकिन आप जानते हैं न उनके यहाँ रुपये पैसे, चाँदी के बर्तन सब के सब इधर उधर जहाँ के तहाँ पड़े रहते हैं, फिर देहाती भुच्चड़ को ट्यूटर बना के भेजे दे रहे हैं।अगर कोई बात हो गई तो------?'
     'कोई बात नहीं साहब, आप नाहक परेशान न होइये मेरी खातिर, व्यर्थ न झगड़िये,देहातियों के पास ईमान धर्म थोड़े ही होता है, वे इन्सान थोड़े हैं ! माता जी के पूर्वज भी शायद शहर के ही रहने वाले थे और ये भी शहर की हैं, इसीलिये इन्सान का दिल दिमाग पायी हैं।मैं चला।'
    रास्ते में जीवन मन ही मन सोचा - 'यहाँ तो निराशा ही हाथ लगी चलो मिस्टर सिन्हा के यहाँ भी देख आते हैं,शायद भाग्य साथ दे दे।'

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     मिस्टर सिन्हा का आश्वासन पाकर बैठे बैठे लगभग तीन घण्टे पूरे होने को आये थे,जीवन अपने आप में बोर होने लगा ,आखिर ठहरा तो इन्सान ही न,फिर भी तृष्णा बढ़ती जा रही थी क्यों कि मिस्टर सिन्हा ने आश्वासन जो दे रखा था।।    
      तभी उधर से गुजर रही बीसवीं शताब्दी की छात्रा की आवाज सुनायी दी - 'देखो !कैसा फटीचर बैठा है!उल्लू जैसी आँखें निकाले।'
      'हिश्-----  ---मनोरमा, तू भी बड़ी वो है विचारे को जो इस तरह की उपाधि से विभूषित कर रही हो।पता नहीं, विचारे पर क्या गुजरी है , भला तुम्हीं देखो, उसका चेहरा कैसा गिरा हुआ है, और एक तू है जो----- ' उसकी सहेली ने कहा।
   हाँ हाँ ,अब बकोगी उपदेश की बातें क्यों कि इसी साल न ---।'
   ' तो क्या हुआ, तुमको भी कोई न कोई मिल जायेगा और न सन्तोष हो तो मेरा एक देवर है कहो तो तुम्हारे लिये अपने 'उनसे' बातें करूँ, बड़े शौक सिंगार से रहता है तुमको भी एकदम राजरानी बनाकर रखेगा और-----।'
   सहसा सामने से आते मिस्टर सिन्हा पर नजर पड़ी और दोनों चुप हो गयीं।
     मिस्टर सिन्हा ने बड़ी संजीदगी के साथ पूछा -'तुम्हारा नाम क्या है बेटा ?'
     'जीवन।'
   इतना सुनते जीवन मन ही मन प्रसन्नता से खिल उठा,सोचा मानों सफलता मिल गयी,इसीलिये पुनः नाम पूँछ रहे हैं।
   तभी मिस्टर सिन्हा बोल पड़े -'बेटा जीवन, हमें अफसोस है हम तुम्हारी सहायता नहीं कर पा रहे हैं ।एक जगह खाली जरूर है क्लर्क की,मगर उस जगह पर मिस्टर वर्मा जो यहाँ के हेड हैं अपना आदमी रखना चाहते हैं और बदले में एक हजार की दक्षिणा माँग रहे हैं बोलो मैं क्या करूँ ?'
    'सर इतनी सामर्थ्य होती तो काहे को इस तरह मारा- मारा फिरता,पढ़ना चहता था आप सबकी दया से पढ़ लेता तो बड़ा उपकार मानता।हो सके तो कोई ट्यूशन आदि ही दिला दीजिये ।'
    'देखो भाई ,मैं इन सबके चक्कर में नहीं पड़ता, न पड़ूँगा। कहीं मिल जाय तो अच्छा है। वैसे मैंने इस कार्य के लिए काफी यत्न किया है, मगर सफलता नहीं मिली।फिर सारी बातें बता ही दी है तुम्हें।जाओ।'
     जीवन निराश मन लिये अतीत और भविष्य के बारे में सोचता गुनता विचारों में खोया-खोया शहर की तरफ लौट रहा था, एक मील आने के बाद भी अभी तकरीबन तीन मिल शेष रह गये थे।हल्की- हल्की बयारों के साथ देखते-देखते ही मेघ घिर आये और अन्धेरा छा गया।।जीवन मस्तिष्क की उलझनों को सुलझाने का प्रयास करते हुए चला जा रहा था कि तेज आँधी का झोंका आया और फिर बूँदा-बाँदी होने लगी।
    ----टिन् टिन् टिन् पीछे से रिक्शे की आवाज सुनकर जीवन किनारे से हो गया।
     फिर बराबरी में होकर रिक्शेवाले ने पूछा - 'कहाँ जाना है भाई ?'
     'कहीं नहीं।'
     'अरे कहीं तो जाना ही होगा?'
     'भाई पूछकर भी क्या करोगे?मेरे पास पैसे नहीं हैं जो तुम्हारे रिक्शे से जा सकूँगा, फिर हमारा तुम्हारा सम्बन्ध ही क्या!'
     अभी भी रिक्शा मन्द गति से बराबरी में चला जा रहा था, जाने क्या सोचकर रिक्शेवाले ने जोर देकर पूछा- 'आखिर जाना कहाँ है?'
   'हमें तो मायापुर जाना है भाई।'
   'अच्छा आइये बैठ जाइये, पैसा मत दीजियेगा' -रिक्शेवाले ने कहा।
   ' नहीं , मैं नहीं बैठूँगा।तुम भी तो इन्सान ही हो खींचकर ले जाओगे और मैं बिना पैसा दिये नवाब बनकर चलूँ यह उचित नहीं है।'
    'रोज दिन भर तो पैसा कमाता ही हूँ भैया, आज के दिन एक बार नहीं सही, और फिर इन्सान ही तो इन्सान की सहायता करता है, दुःख दर्द समझता है और साथ देता है।'
      जीवन के विचार ने साथ दिया और वह उचककर रिक्शे पर जा बैठा।
     सड़क के अगल - बगल की दुकानें किनारों पर खड़े पेड़ सब पीछे छूटते जा रहे थे, रिक्शा द्रुतगति से भागा जा रहा था और वे दोनों मौन थे। कुछ क्षण बाद फिर रिक्शेवाले ने ही मौन भंग करते हुये पूछा -' कहाँ के रहने वाले हो बाबू ?'
    तब जीवन ने उत्तर दिया-'जौनपुर का रहने वाला हूँ।'
    'जौनपुर के?कौन स्टेशन उतरते हैं ?'
    'जफराबाद।'
    'और गाँव कौन सा है?'
     'मदनपुरा।'
     'मदनपुरा?रिक्शेवाले ने धीरे से कहा और पीछे को मुख करके पूछा -'सुरेश पण्डित को जानते हैं ?'
    'हाँ,हाँ वे तो हमारे पट्टीदारी के चाचा लगते हैं।तुम कैसे जानते हो उनको ?'
    'हम भी वंशीपुर के रहने वाले हैं बाबू, वे ही हमारे पुरोहित हैं।अच्छा तो आप बन्नू पण्डित जी को भी जानते होंगे ?'
    'हाँ- हाँ,वे तो हमारे खास चाचा ही हैं फिर जब उसी गाँव का ठहरा तो गाँव के लोगों को भी न जानूँ यह कैसे ?'
    ' तो, वे आप के चाचा हैं ? क्या आप छन्नू पण्डित जी के लड़के हैं?' 
            
                     - शेष अगले भाग में 

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