फटीचर - अन्तिम भाग
प्रथम भाग के आगे -
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' हाँ जी।'
'राम - राम बड़े साधु आदमी थे विचारे।अंग्रेजों के गदर में मारे गये, जाने किस पापी हत्यारे ने मार डाला ऐसे गऊ आदमी को, हमको बड़ा मानते थे विचारे।'
पुनः कुछ देर मौन छाया रहा।फिर रिक्शेवाले ने ही पूछा-'अच्छा तो यहाँ क्या करने आये हैं आप ? कोई काम है या यूँ ही घूमने?'
'आया तो था पढ़ने मगर.....।'
'बोलिये बोलिये ,रुक क्यों गये?'
'क्या बताऊँ, छोड़ो जाने दो।'
' क्यों, क्या बात है ? दुखी लग रहे हैं आप।'
'हाँ भाई, खैर सुनो! -जब सारी बातें जानते ही हो गाँव घर की तो तुमसे क्या छिपाना,इसी साल मैंने गाँव के कालेज से बी.ए.प्रथम वर्ष की परीक्षा उत्तीर्ण की है, और जब आगे पढ़ने के लिये फाइनल में नाम लिखाने को कहा चाचा जी से तो वे नाराज हो गये,और कहने लगे मैं तुम्हारी पढ़ाई - वढ़ाई का खर्च न दे सकूँगा।पढ़कर वैरिस्टर नहीं हो जाओगे, इतना बहुत है काम भर के लिये, चलो खेती बारी का काम देखो।अपनी मनवाली करनी हो तो घर से चले जाओ,हमसे न पार लगेगा खर्च देते, जहाँ इच्छा हो वहाँ जाकर जो करना है सो करो,मैं नहीं जानता।'
'तो काम धाम कहीं मिला कि नहीं ?' -रिक्शेवाले ने पूछा।
'अभी तक तो काम धाम कहीं नहीं मिला, आगे की भगवान जाने।'
'इस समय तो भाई यूँ ही सड़कों की पटरियों पर सोकर रात गुजरती है और फिर घूमते दिन।'
'फिर तो आप हमारे यहाँ चलिये, कोई एतराज तो नहीं होगा आपको?'
'नहीं-नहीं, एतराज क्यों होगा।अब तो गाँव घर की बात है।'
-कुछ क्षणों बाद रिक्शा आगे जाकर रुका,और रिक्शेवाले ने उतर कर सड़क से सटी एक छोटी सी कोठरी के सामने रिक्शा लाकर खड़ा कर दिया, और फिर उस कोठरी को खोलकर दीपक जलाने के बाद अन्दर से ही आवाज दिया-'आइये पण्डित जी!'
कोठरी के अन्दर जमीन पर पैबन्द लगा हुआ बोरा बिछा हुआ था । जीवन उसी पर जा बैठा।
देर पीछे रिक्शेवाले ने पूछा -'पण्डितजी!क्या खाइयेगा क्या लाऊँ आपके लिये? मेरे लिये तो दिन की रोटी है, है तो दो आदमी भर के लिये, मगर आप तो मेरा छुवा खायेंगे नहीं ?'
'मैं, मैं तो खा लूँगा 'इन्सान'का छुवा खाने में दोष नहीं मानता।'
दो दिन यूँ ही जाने कैसे गुजर गये।पता भी नहीं चला फिर तीसरे दिन जीवन ने ही कहा -'रामू भैया, देखो न दो दिन बीत गये , मुफ्त में बैठे-बैठे खा रहा हूँ अच्छा नहीं लगता और काम मिलने को है नहीं । इससे अच्छा तो यह है कि मुझे भी रिक्शा चलाना सिखा दो तो मैं भी रिक्शा चलाऊँ ।'
'अरे राम राम!आप ब्राह्मण देवता होकर रिक्शा चलायेंगे ? आप को शोभा नहीं देगा।'
'आखिर कर्म करके खाने में दोष क्या है ? और ब्राह्मण हैं तो कोई ऐसे बिठाकर तो खिलायेगा नहीं ?'
और फिर घण्टा दिन सप्ताह बीतते पन्द्रह दिन गुजर गये तो जीवन ने एक दिन पुनः कहा -'रामू भैया!अब तो कुछ पैसे भी हो गये हैं अपने पास और अभी नाम भी लिखा जा रहा है, कहो तो नाम लिखा लूँ ? रात में रिक्शा चलाऊँगा और दिन में पढ़ूँगा।'
' मैं भी यही सोच रहा था कि आप किसी तरह पढ़ लेते तो सारा कष्ट दूर हो जाता मगर रिक्शा चलाकर पढ़ पायेंगे, कैसे पढ़ेंगे?'
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'.....अरे सरला! देखो न उस दिन आफिस की तरफ जो फटीचर बेंच पर बैठा था वह भी आया है क्लास में, लगता है नाम लिखाया है क्या ?'
' तू तो बड़ी मूर्ख लग रही है, लिखाया है तभी तो क्लास में बैठा है।और तू फटीचर - फटीचर क्यों किसी को कहती है ?'
'फिर क्या कहूँ, फटीचर न कहूँ तो टीचर कहूँ ? अरे जब नाम नहीं मालूम तो सम्बोधन के लिये कुछ तो कहना ही होगा ।'
इसीलिये इतना सुन्दर नाम चुनी हो , हाँ न ? बोलो बोलो ?'
तीन माह गुजर गये फिर भी जीवन पूर्व की ही तरह क्लास में आता और क्लास ज्वाइन करता और चलते बनता। न किसी से बोलना न चालना। कालेज के कुछ लड़के उसे चुप्पा कहते तो कुछ गूँगा पर जीवन किसी का प्रतिकार न करता और अपने सूखे अधरों पर हँसी बिखेर सबकी सुन लेता।
शारदावकाश के बाद कॉलेज खुला था। सभी लड़के फिल्ड में इधर - उधर घूम रहे थे, तभी मनोरमा की दृष्टि जीवन पर पड़ी और एकाएक कह उठी -'फटीचर ।'
और यह सम्बोधन सुनते ही सरला बिगड़ उठी थी -'देख मनोरमा, तेरी यह आदत ठीक नहीं है, कम से कम बोलना सीख , पहले तो तुझे नाम नहीं मालूम था पर अब तो मालूम हो गया है न? अगर ऐसी आदत बनी रही तो वहाँ भी ऐसे ही बोलोगी।'
'कहाँ ?'
'ससुराल में बालम के यहाँ, और कहाँ ?'
'धत् !'और फिर शर्माकर चुप लगा गयी।'
तब सरला ने कहा-' दिखा क्या रही थी,यही न कि नया सूट पहनकर आया है ? लेकिन यह समझो कि तुमसे अधिक सुन्दर लग रहा है, इतना सुन्दर कि जो मेरी शादी न हुई होती तो मैं.......।'
कॉलेज में वार्षिकोत्सव मनाया जा रहा था।साथ ही डिबेट का भी आयोजन रहा ।नम्बर आने पर सभी प्रतियोगी क्रमशः मंच पर पहुँच, बोलकर चले आ रहे थे।नम्बर आने पर मनोरमा भी अपनी तैयारी के अनुसार बोलकर बैठ गयी।फिर नम्बर आया जीवन का।जीवन बोलने को खड़ा हुआ तो उसे देखकर एक बार लड़कियों की ओर से जोरदार ठहाका गूँजा।तभी मनोरमा ने सरला से कहा -'देखो फटीचर भी खड़ा है बोलने के लिये।'
सरला सुनकर भी जानें क्यों चुप लगा गयी।
जीवन ने समाज में व्याप्त शोषण प्रवृत्ति का उल्लेख करते हुए धनिकों की और आधुनिक नेताओं की बखिया उधेड़ कर रख दी।-'जो दिन रात ऐश आराम की जिन्दगी व्यतीत करना जानते हैं नख से सिख तक नाना प्रकार के कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधनों से शरीर को सजाया रखना चाहते हैं, क्या वे गरीबों का लहू पीने वाले लोग समाज का नेतृत्व कर सकते हैं ? नहीं।' और फिर उसने बताया कि समाज में ये ये कठिनाइयाँ हैं व इस प्रकार से समाज को बदला जा सकता है तथा स्वस्थ रखा जा सकता है।
जीवन का भाषण समाप्त हुआ तो हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
कुछ देर बाद निर्णायकों का निर्णय जब सुनने को मिला तो सभी दंग रह गये।निर्णय इस प्रकार था -जीवन प्रथम, शरत द्वितीय, मनोरमा तृतीय।
परिणाम सुनने के बाद मनोरमा के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं, तब मौका पाते ही सरला भी बरस पड़ी -' तुम्हें शर्म नहीं आती है दूसरों का इस तरह उपहास करने में ? कभी आईना में मुँह देखा है अपना, कैसा है ? बड़ा नाज था न, तुम्हें अपने ऊपर ,कहाँ गया तेरा भाषण ? सुन ली फटीचर का भी ,और सुन लिया निर्णय,या नहीं ?'
मनोरमा का मुख शर्म से लाल सूर्ख हो उठा और चुप्पी साध गयी।और फिर धीरे से जाने कब घर चली आई।
कॉलेज से लौटने के बाद मनोरमा को जाने क्या हो गया चुपचाप अध्ययन कक्ष में चली गयी और एक अज्ञात हल्की सी मीठी- मीठी सी अनुभूति दबाये कल्पना सागर में डूबने उतराने लगी।फिर भी मन न लगा तो शाकुन्तलम् का चतुर्थ अंक खोलकर व्याख्या लगाने लगी,तो भी मन न लगा।पन्नों पर अक्षरों की जगह किसी का चित्र दिखाई दे रहा था।
मन ने पूछा-'किसे देख रही हो, फटीचर को ?'
'नहीं - नहीं, जीवन को' -हृदय ने कहा।
मन ने पुनः पूछा -'क्यों, क्या हो गया तुझे फटीचर कहते नहीं बनता ?'
तब होंठ अपने आप बुदबुदा उठे -'नहीं... नहीं...।'
दिन रात मनोरमा को चैन नहीं पड़ती।जब देखो तब जीवन का चेहरा उसकी आँखों के सामने उभर आता, एकान्त पाते ही कल्पनाएँ हिलोरें लेने लगतीं और उसे जाने कैसी मीठी-मीठी सी गुदगुदी होने लगती।
इम्तिहान नजदीक आ गये थे और पढ़ाई खूब जमकर होने लगी थी।मनोरमा रोज - ब- रोज कोई न कोई बहाना लेकर जीवन के समक्ष आ खड़ी होती, और धीरे से वाणी में मिसिरी घोलकर कहती - 'एक चीज माँगू ?'
तब जीवन हँसते हुए कह देता -'माँगिये न।'
फिर मनोरमा अधरों पर मुस्कान बिखेरकर पूछती -'मना तो नहीं करेंगे ?'
तब जीवन मन्द मुस्कानों के बीच कहता -'मना करने की क्षमता और मुझ फटीचर में ? माँगिये न ,होगा तो अवश्य दूँगा।'
और तब मनोरमा मुँह छिपाकर माँगती, कभी नोट्स की कॉपी तो कभी कोई किताब।
ऐसे में ही एक दिन कालिदास का महान ग्रन्थ शाकुन्तलम् माँग कर ले गयी थी, दूसरे दिन जब पुस्तक लौटाने लगी तो हौले - हौले पुस्तक हाथ से छूट गयी, और जमीन पर गिरते ही जिल्द अलग हो गयी। तब सहमी हुई ,लज्जा में डूबकर मनोरमा ने झुककर पुस्तक उठा लिया और शर्माते हुये कहा -'क्षमा कीजिएगा, कल इसे मढ़वा कर दे दूँगी।'
तब उत्तर में जीवन ने कहा -'आपने जानकर तो नहीं फाड़ी,'और पुस्तक उसके हाथ से ले ली।
परीक्षा शुरू हुई और फिर समाप्त भी हो गयी ।जीवन के सभी पेपर्स अच्छे हुए।वह अत्यंत संतुष्ट था और मनोरमा से बिना मिले ही चला गया।
गरमी की छुट्टियों में ही रिजल्ट निकल गया, जीवन की प्रथम श्रेणी आई।मनोरमा और सरला भी पास हो गईं।
फिर छुट्टियों के बाद कॉलेज खुला और नये पुराने लड़के कॉलेज में एडमिशन लेने लगे।मनोरमा और सरला ने भी एम.ए.में एडमिशन ले लिया।
पूरा माह गुजर गया , जीवन जब कॉलेज में न दिखा तो एक दिन एकान्त पाकर मनोरमा सरला से पूछ बैठी -'उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी क्या ?'
'कौन ?'-सरला ने पूछा।
'जीवन जी।'
'वाह रे जीवन की शुभचिंतक! कहाँ गया तेरा फटीचर?अब फटीचर कहते नहीं बनता ?'
'तुम्हीं ने तो उस दिन कहा था, ग्रेजुएट हो रही हो बोलना सीखो अब तुम्हीं बताओ कि किस तरह बोलूँ ?, ऐसे बोलूँ,तो भी आफत और वैसे बोलूँ तो भी ....।'
'अच्छा - अच्छा, नाराज न हो।'
' तो फिर बताओ न,परीक्षा के बाद तुमने उनको कहीं देखा था क्या? '
' देखा तो नहीं, हाँ एक दिन निर्मल से पूछी अवश्य थी सो वही बता रहा था कि आजकल इलाहाबाद में सर्विस कर रहे हैं।'
' ...च...च...च!लगता है अब भेंट न होगी।'
'क्यों कोई काम वाम है क्या ? या कि लग गया है ?'
'क्या लग गया है ?'
' वही-वही , जिसे लोग दिल कहते हैं।'
'धत् ।'
'फिर इतना अपनत्व कब से हो गया है उनके प्रति, जो आज पूछ रही हो और मिलना भी चाहती हो ?'
' क्यों इतना ही कम है क्या, जो उन्हीं के चलते प्रथम श्रेणी आ गई।और सच पूछो तो वे तो किसी आराध्य देवता की तरह मन में बस गये हैं। यदि...।'
धीरे - धीरे साल गुजर गया।परीक्षा के दिन आये और परीक्षाएं भी हो गयीं।,फिर गरमी की वही छुट्टियाँ।
सरला ने सुबह ही नौकर से कहलवा भेजा था पिक्चर चलने के लिये।पिक्चर के हीरो हिरोइन दोनों सरला और मनोरमा के मन पसन्द कलाकार थे,सो कपड़े आदि पहनकर मनोरमा पहले से ही तैयार हो घड़ी पर निगाह जमाये बैठी थी।
ठीक ग्यारह पचास पर सरला जब कमरे में दाखिल हुई तो मनोरमा झुँझलाकर बरस पड़ी,और कहने लगी - 'जाओ तुम्हीं अकेली पिक्चर देखने,अब मैं नहीं जाऊँगी।'
'क्यों क्या बात है ?'
'क्यों क्यों क्या कर रही हो, धूप में परेशान होने जाऊँ।जानती हो कि पुरानी पिक्चर है भीड़ होगी, तो भी देर करके आई ।'
'अब टिकिट् मिलेगा भी ?'
सरला ने हँसते हुए कहा- 'अरे बाबा, यही बात पहले और धीरे से कही होती।तभी से लेक्चर झाड़े जा रही हो।लो अपना टिकट इसीलिये तो एडवांस बुकिंग करा लिया था मैंने।'
..... तभी दरवाजे पर का पर्दा उठा और हाथ में एक लिफाफा लिये मनोरमा की माँ आ खड़ी हुईं।फिर सरला की तरफ मुखातिब हो कहने लगीं -'अच्छा हुआ बेटी जो तू भी आ गई।'
दोनों आश्चर्यचकित हो फटी आँखों से अम्मा को देखने लगीं, फिर सरला ने ही पूछा -"क्या काम है अम्मा?ऐसी कौन सी बात है ?''
तब अम्मा ने प्रसन्न मन से कहा - 'फोटो लाई हूँ तुम्हें दिखाने के लिये।'
'फोटो ? किसका फोटो ?' सरला ने पूछा।
'अरे पगली, अभी तक नहीं समझी ? तेरे चाचा ने लड़का देखा है न मनोरमा के लिये, उसी का। लिखा है कि -" ये लड़का मेरे ही आऑफिस में काम करता था बड़े बाबू के पद पर और अभी-अभी पन्द्रह दिन हुए पी. सी. एस.के कम्पटीशन में आ गया है।घर का अकेला है, जो कुछ देना है इन्हीं दोनों को।'
तभी बगल के कमरे से कुछ गिरने की आवाज आयी और मनोरमा की माँ सरला को लिफाफा पकड़ाकर हौले- हौले उस कमरे की ओर भागीं।
माँ के चले जाने पर सरला ने ही लिफाफा खोला और दूसरे ही क्षण फोटो पर निगाह पड़ते स्तब्ध रह गयी।
सरला को इस तरह आश्चर्ययुक्त देख मनोरमा ने पूछा
-' क्या बात है?'
तब सरला ने धीरे से कहा -'फटीचर!'
'अयँ,देखूँ!'
'अरे!ये तो जीवन जी हैं, मेरे जीवन।'
'ठीक से देख, जीवन नहीं फटीचर।'
पर शायद मनोरमा खुशी के मारे सुन न सकी और "जीवन, मेरे जीवन" कहते हुए चित्र को सीने से लगा ली।
घड़ी पीछे अम्मा लौटीं तो वे दोनों पिक्चर जा चुकी थीं
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