प्रणाम

  प्रणाम
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      विद्यालय के लिए रिक्शे पर बैठते ही सुनन्दा ने पूछा -'क्यों री चन्दा! पाठक जी की पत्नी कल शाम को तो उनसे तुम्हारी शिकायत कर रही थी।वैसे शिकायत तो एक दिन पहले भी कर रही थी कि मस्टराई की नौकरी क्या पा गयी लगता है लाट गवर्नर हो गयी, पर सुबह देखी तो तुमसे मुँह में मुँह डालकर ऐसे बातें कर रही थी मानो शकुन्तला और प्रियम्वदा बातें कर रही हों। क्या सब्जेक्ट रहा, किसकी निन्दा स्तुति हो रही थी?'
      फिर एक क्षण रुककर मुस्कुराते हुए सुनन्दा ने पुनः कहना शुरू किया - 'हम औरतों के जिम्मे और कुछ है भी तो नहीं, फुर्सत के क्षणों में किसी रिस्तेदार - नातेदार, अड़ोसी-पड़ोसी की निन्दा या प्रशंसा, मानो यही थकान मिटाने की दवा हो। अच्छा तो बता, आज का सन्दर्भ किससे जुड़ा हुआ था?'
      'कुछ नहीं, यूँ ही बातें हो रही थी।' - चन्दा ने कहा।
     चन्दा को बातें घुमाते जानकर सुनन्दा ने चन्दा की ओर मुँह करके गम्भीरता से पूछा - 'यूँ ही बातें हो रही थी तो बार बार आचार्याणी आचार्याणी जी क्यों कह रही थीं ,ये आचार्याणी जी कौन हैं? तुम भी उन्हीं का नाम ले रही थी और पाठक जी की पत्नी भी।'
      कुछ देर रुककर फिर कहना शुरू की - 'कल तुम्हारे दरवाजे पर पहुँचते ही कमरे के अन्दर से आती तेज आवाज सुनकर मैं ठिठक गई थी, तभी तो सब कुछ सुनने को मिला।सोची थी कि आज जरा जल्दी पहुँचकर तुमसे बेटे के लिए नई डिजाइन के स्वेटर का फन्दा डलवाऊँगी पर सब गुड़ गोबर हो गया। खैर छोड़ो, बताओ क्या बात थी?स्वेटर का फन्दा तो विद्यालय में चलकर लंच के वक्त भी तुमसे डलवा लूँगी। तुम तो जानती ही हो विद्यालय में बच्चों को चिल्ला- चिल्लाकर पढ़ते देख हेडमास्टर साहब कुढ़ते हैं, उन्हें तो बस खर्राटा लेने की ही मानों सरकार ने नौकरी दे रखी है।इसीलिये तो लोग सरकारी स्कूलों में अब बच्चों को भेजना नहीं चाहते।'
        सुनन्दा की बातें सुन चन्दा भी गम्भीर होकर कहने लगी-'हाँ सुनन्दा बात तो सही है, पर पानी में रहकर मगर से वैर तो किया नहीं जा सकता।फिर भी हम और तुम तो बच्चों को थोड़ा बहुत कुछ न कुछ पढ़ा ही देते हैं, बाकी लोग तो जनगणना, और राशनकार्ड बनवाने के लिए ही जैसे नौकरी किये हैं।कभी-कभी क्या हर महीने दो महीने पर पोलियो ड्राप का अभियान भी हम लोगों को परेशान करके रख ही देता है।'
      तब सुनन्दा ने बीच में ही बात काटते हुए कहा -'अच्छा छोड़ो ये सब, मूल विषय पर आओ कि कल कौन सी बात हो रही थी?'
       चन्दा ने कहा -' बात कुछ नहीं थी और समझो तो बहुत बड़ी थी।किसी भी व्यक्ति को ऊँचा आसन देकर अकारण यदि उसे आसन से उतारना हो तो मैं कहती हूँ आसन देना ही नहीं चाहिये। आदर और श्रद्धा राह चलते न किसी को दिया जाता है और न किसी से मिलता है।तुलसीदास जी ने लिखा भी है- 'बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।'
       'हाँ, यह बात तो सही है, पर हुआ क्या ?'
       'हुआ यह कि जिन आचार्याणीजी की बातें हो रही थीं उन्हें प्रथम बार मिलते ही पाठक जी की पत्नी ने सर आँखों पर बिठा लिया और महीना दो महीना भी नहीं बीता, उनसे कोई व्यावहारिक गल्ती भी नहीं हुई कि वे दूध की मख्खी बन गईं। बात इतनी है कि वे उमर में पाठकजी  की पत्नी से छोटी हैं। तुम्हीं बताओ, अब यह भी कोई बात हुई  कोई भी व्यक्ति अपने से बड़े या छोटे, किसी भी सुपात्र व्यक्ति को प्रणाम करे तो उसके बदले में उसे कुछ न कुछ मिलता ही है। उसका जाता कुछ नहीं है।शास्त्रों में कहा है - 
" अभिवादनशीलस्य    नित्यं   वृद्धोपसेविनः।
 चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।"
       मैं तो कहती हूँ प्रणाम करने से प्रणामकर्ता को वह मिलता है जो रूपयों पैसों  या किसी और वस्तु के बदले नहीं प्राप्त किया जा सकता।इसका सबसे बड़ा उदाहरण मृकण्डु ऋषि के पुत्र मार्कण्डेय ऋषि हैं जिन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था।जानती हो?,मृकण्डु ऋषि वयोवृद्ध थे और जिन्हें प्रणाम किये थे वे चारो पाँच वर्ष के बालक जैसे थे, बाद में ज्ञात हुआ कि वे ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सनक,सनन्दन सनातन और सनत्कुमार हैं।किन्तु वहाँ ऋषि और ऋषि पुत्र ने संकोच नहीं किया, और यदि संकोच किये होते अथवा उम्र के कारण उपेक्षा किये होते तो यह ऐतिहासिक वरदान उन्हें न मिल पाता।शायद वे प्रथम व्यक्ति हैं जिन्हें इच्छामृत्यु का वरदान मिला।'
     रिक्शेवाले को गड्ढे बचाकर धीरे धीरे चलने की हिदायत
देते हुए चन्दा ने पुनः कहना शुरू किया -'दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि सर्प या बिच्छू का बच्चा ही क्यों न हो उसकी लहर कम नहीं होती।तुलसी का पौधा बड़ा हो या छोटा उसके पत्ती की महत्ता कम नहीं होती।शालिग्राम की बटिया बड़ी हो या छोटी सभी प्रणम्य हैं, पूज्य हैं।यदि उम्र की बात की जाय तो तुम्हीं देखो इस व्यावहारिक जगत में पार्टा का कोई नेता छोटी उम्र का हो तो भी उसके आगे उसके पिता और पितामह की उम्र के कार्यकर्ता पानी भरते हैं।आई.एस.,पी.सी.एस.अधिकारी नई उम्र का कोई लड़का चयनित होता है परंतु उसके आगे रिटायरमेंट के नजदीक पहुँचे लोग यस् सर् ,यस् सर् कहते और सल्यूट मारते नहीं थकते।वहाँ उम्र अधिकारी या कर्मचारी के मध्य छिपी नहीं होती किन्तु पद के आगे कद छोटी पड़ जाती है, अत एव संकोच या शर्म का कोई स्थान नहीं होता।इतना ही नहीं अधिकारी वह व्यक्ति होता है न कि उसकी पत्नी या पति किन्तु पति या पत्नी की भी उतनी ही इज्ज़त व कदर होती है।उसके आदेश को भी कोई उम्रदराज कर्मचारी टालने की जुर्रत नहीं कर पाता।और देखने को तो यहाँ तक मिलता है कि पत्नी या पति की प्रसन्नता ही कई एक कर्मचारी की भाग्य
रेखा तक बदल देती है।जब कि अधिकारी कोई और होता है।
        'हाँ,यह तो तुम सोलह आने सच कह रही हो।'-सुनन्दा ने हुँकारी भरते हुए कहा।
        तब चन्दा पुनः कहने लगी - ' सुनन्दा मुझे तो पाठक जी की पत्नी का व्यवहार कत्तई अच्छा नहीं लगा,और फिर सीधी सी बात है किसी का भी यदि बाद में निरादर करना है तो पहले ही उसे आदर न दे।पहली बार और दूसरी बार तो पाठकजी की पत्नी आँचल से यूँ प्रणाम कीं लगा जैसे किसी बड़ी बूढ़ी से आशीष ले रही हों,जैसे आचार्य जी की पत्नी ही उनकी सास या सब कुछ हों।हमारे यहाँ तो अपने जेठ के बच्चों से भी पैर नहीं छुवाते ,और ब्राह्मण वटु चाहे कितनी ही छोटी उम्र के क्यों न हों उनके पैर आँचल से छूकर आशीर्वाद लेना ही लेना है।तुम्हीं बताओ कुमारी पूजन और वटुक पूजन में उम्र क्यों नहीं आड़े आती?'
     कुछ देर रुककर मुँह बनाते हुये चन्दा पुनः कहने लगी -'मुझे तो आश्चर्य तब हुआ जब माता आनन्दमयी अस्पताल में उनके साथ अपने को दिखाने गयी थी और पर्ची जमाकर अपने नम्बर आने की प्रतीक्षा कर रही थी कि कुछ देर बाद ही एक महिला बगल में आकर धम्म से बैठ गयी, उसके हाथ में न चूड़ियाँ थीऔर न पाँव में पायल, माथे पर माँग के पास छोटा सा सिन्दूर का टीका अवश्य लगा हुआ था।गर्मी का दिन था अतः पर्याप्त पाउडर पोत रखी थी।उससे आँख मिलते ही पाठक जी की पत्नी चट् से उठकर उसका पैर छू लीं।उनके पैर छूने का मतलब मुझे भी छूना ही था।वह औरत मेरे लिए नितांत अपरिचित थी मगर मुझे कत्तई अच्छी नहीं लग रही थी।' 
      उस समय तो नहीं परन्तु अस्पताल से लौटते वक्त रिक्शे पर बैठने के बाद मैंने पाठक जी की पत्नी से पूछा - ' चाचीजी!जिनका आपने पैर छुआ है, वे कौन थीं ?'
      उन्होंने बताया -'आचार्य जी की पत्नी।'
      मैंने पूछा -'पत्नी थीं?'
      उन्होंने कहा -'हाँ, पूर्व पत्नी थीं।अपने पति और बच्चों का परित्याग कर, सम्बन्ध को त्याग सम्प्रति सम्पत्ति को पकड़ बैठी हैं।'
      मैंने पूछा -'सम्बन्ध और सम्पत्ति का अभिप्राय नहीं समझी ?'
      तब कहने लगीं -'उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है, कुछ दिनों पहले बच्चों और पति का साथ छोड़कर एक सुन्दर युवक के साथ घर से निकल गयीं।फिर वापस आई तो इन्हें वे लोग आँख की किरकिरी सा लगने लगे।बच्चों का भविष्य और आचार्यजी की सामाजिक मर्यादा समाप्त हो चुकी थी, इसलिये आचार्यजी भी इनके साथ रहना उचित नहीं समझे।उस स्थिति में कोई भी निकम्मा से निकम्मा पुरुष किसी ऐसी स्त्री को नहीं स्वीकारेगा, भला आचार्यजी कैसे स्वीकारते।वे जिस राह पर चल रही हैं उस पर चलना तो दूर, दिखाई पड़ जाने मात्र से नारी अपने घर - परिवार, रिश्ते - नाते,छोटे -बड़े हर किसी की निगाह से गिर जाती है।वह कुलीन और आदरणीय तो कत्तई नहीं रह जाती।जब कि उस मार्ग पर ये निरंकुश होकर दौड़ रही हैं। तुम तो जानती हो नारी के लिए पति या पिता का भय नहीं होता, अपितु हृदय के आन्तरिक भाव,और उस भाव में छिपी शील व मर्यादा, परिवार एवं समाज पर पड़ने वाले सामाजिक प्रभाव की आँच ही सख्त व ढीले ब्रेक का काम करती है। सुनन्दा!इतना शाश्वत सत्य है कि नारी स्वयं यदि भ्रष्ट नहीं होती तो दुनिया की कोई शक्ति उसे भ्रष्ट नहीं कर सकती।नारी की तीन कोटियों में वह अधम और तीसरी कोटि का वरण कर चुकी हैं।'
     लम्बी साँस लेने के बाद पुनः कहने लगी -'इन्हीं कारणों से आचार्य जी को दूसरी शादी करनी पड़ी।उनकी दूसरी पत्नी उम्र में अवश्य छोटी हैं।सच पूछो तो अभी उनकी उम्र खेलने खाने की है,वैवाहिक जीवन के प्रथम चरण का पतिजन्य सुख भोगने एवं जिम्मेदारी से मुक्त शोख चंचल अल्हणता से युक्त आनन्द उठाने की है। किन्तु देखने में ठीक उसके विपरीत मिलता है, उन्हें तो प्रसव पीड़ा का अहसास भी नहीं हुआ, स्तन में दूध भी नहीं आये और पाँच- पाँच बच्चों का जिम्मेदारी से पालन - पोषण कर रही हैं। उन्हीं बच्चों की नींद से सोना और उन्हीं के नींद से जागना।बच्चे कहीं खेल कूद में रम गये या स्कूल से आने में विलम्ब हुआ तो छटपटा उठती हैं। पूछने पर कहतीं फलां अभी  आया नहीं तो अमुक ने अभी तक खाया नहीं है। बच्चे चाहे घी की गगरी उड़ेल दें डाँटना तो जानती ही नहीं।मानों क्रोध को जीत ली हों।'
   आचार्य जी गोरखपुर प्रवास की लम्बी अवधि के बाद जब लौटे थे और उनकी सहचरी का प्रथम सक्षात्कार हुआ था तो पाठक जी की पत्नी जिन्हें मैं चाचीजी कहती हूँ वे  'उन्हें' काफी ऊँचा पीढ़ा दी थीं।उनका प्रणाम करना , हर बात में आप आप करना देख मुझे काफी अच्छा लगा था।यह क्रम दो तीन बार तक देखने को मिला फिर जाने क्या हुआ कि आचार्याणी जी का चरणस्पर्श बन्द। दूर से ही नमस्कार, पर आचार्याणी जी के चेहरे पर कोई असर दृष्टिगत नहीं हुआ।हाँ, आचार्यजी को दुःख उस दिन अवश्य हुआ था जब किसी प्रसंगवश आचार्यजी से ही पाठक जी की पत्नी पूछ बैठीं कि -"गुड्डी" नहीं दिखाई दे रहीं? यह गुड्डी उनका उपनाम था।प्रथम संतान होने के नाते उनके माता- पिता ने यह नामकरण कर रखा था।हमारी भारतीय परम्परा में तो बड़ी सन्तान या अपने बड़े का नाम नहीं लिया जाता है, तुम तो जानती ही हो।'
सुनन्दा ने कहा- हाँ,हाँ एक श्लोक भी है--
      आत्मनाम   गुरोर्नाम   नामाति   कृपणस्य च।
      श्रेयस्कामो न गृह्णीया ज्येष्ठा पत्यु कलत्रयोः।।
     श्लोक सुनकर चन्दा प्रसन्न हो उठी और बोल पड़ी -'वाह भाई, वाह! तुम्हें तो पूरा सूत्र ही याद है।'
      यह सुनकर सुनन्दा मुस्कुरा उठी।
    चन्दा ने आगे कहा -'उस दिन आचार्य जी के चेहरे से ऐसा लगा कि उन्हें आत्मिक दुःख हुआ है, हो भी क्यों न, उनकी अर्धांगिनी, विपत्ति की सहायिका जो ठहरीं, किन्तु कुछ भी प्रगट नहीं होने दिये। मैं इस घटनाक्रम की प्रत्यक्षदर्शी थी अतः मन में ठान ली कि इसका वे तो उत्त नहीं दिये किन्तु मैं अवश्य दूँगी।संयोगवश एक सप्ताह बाद ही मुझे भतीजे के मुण्डन में मायके जाना पड़ा, अपनी मानसिक प्रतिज्ञा के अनुसार साहस नहीं जुटा पायी कि विना प्रणाम किये चली जाऊँ सो चरण न छूकर दूर से ही मैंने भी कहा -' चाचीजी! माँ के यहाँ जा रही हूँ,ट्रेन का समय हो गया है, परसों आऊँगी "प्रणाम"और चली गई।'
         तीसरे दिन मायके से लौटकर मैंने वैसा ही किया और पाहुर लेकर उन्हें देने गई तो वे आपे से बाहर हो गयीं,चेहरे पर क्रोध और घृणा के भाव लाते हुए बोलीं -'रख दो।'मै वहीं 
जमीन पर पड़े प्लेट में पाहुर रखकर चुपचाप चली आयी।
        
    

        

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