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प्रणाम

  प्रणाम *******       विद्यालय के लिए रिक्शे पर बैठते ही सुनन्दा ने पूछा -'क्यों री चन्दा! पाठक जी की पत्नी कल शाम को तो उनसे तुम्हारी शिकायत कर रही थी।वैसे शिकायत तो एक दिन पहले भी कर रही थी कि मस्टराई की नौकरी क्या पा गयी लगता है लाट गवर्नर हो गयी, पर सुबह देखी तो तुमसे मुँह में मुँह डालकर ऐसे बातें कर रही थी मानो शकुन्तला और प्रियम्वदा बातें कर रही हों। क्या सब्जेक्ट रहा, किसकी निन्दा स्तुति हो रही थी?'       फिर एक क्षण रुककर मुस्कुराते हुए सुनन्दा ने पुनः कहना शुरू किया - 'हम औरतों के जिम्मे और कुछ है भी तो नहीं, फुर्सत के क्षणों में किसी रिस्तेदार - नातेदार, अड़ोसी-पड़ोसी की निन्दा या प्रशंसा, मानो यही थकान मिटाने की दवा हो। अच्छा तो बता, आज का सन्दर्भ किससे जुड़ा हुआ था?'       'कुछ नहीं, यूँ ही बातें हो रही थी।' - चन्दा ने कहा।      चन्दा को बातें घुमाते जानकर सुनन्दा ने चन्दा की ओर मुँह करके गम्भीरता से पूछा - 'यूँ ही बातें हो रही थी तो बार बार आचार्याणी आचार्याणी जी क्यों कह रही थीं ,ये आचार्याणी जी कौन हैं? तुम भी...

फटीचर - अन्तिम भाग

             प्रथम भाग के आगे -              ****************     ' हाँ जी।'     'राम - राम बड़े साधु आदमी थे विचारे।अंग्रेजों के गदर में मारे गये, जाने किस पापी हत्यारे ने मार डाला ऐसे गऊ आदमी को, हमको बड़ा मानते थे विचारे।'     पुनः कुछ देर मौन छाया रहा।फिर रिक्शेवाले ने ही पूछा-'अच्छा तो यहाँ क्या करने आये हैं आप ? कोई काम है या यूँ ही घूमने?'   'आया तो था पढ़ने मगर.....।'  'बोलिये बोलिये ,रुक क्यों गये?'  'क्या बताऊँ, छोड़ो जाने दो।'  ' क्यों, क्या बात है ? दुखी लग रहे हैं आप।'  'हाँ भाई, खैर सुनो! -जब सारी बातें जानते ही हो गाँव घर की तो तुमसे क्या छिपाना,इसी साल मैंने गाँव के कालेज से बी.ए.प्रथम वर्ष की परीक्षा उत्तीर्ण की है, और जब आगे पढ़ने के लिये फाइनल में नाम लिखाने को कहा चाचा जी से तो वे नाराज हो गये,और कहने लगे मैं तुम्हारी पढ़ाई - वढ़ाई का खर्च न दे सकूँगा।पढ़कर वैरिस्टर नहीं हो जाओगे, इतना बहुत है काम भर के लिये, चलो खेती बारी का काम देखो।अपनी मनवाली करनी ...

फटीचर - प्रथम भाग

फटीचर *******    खिड़की के किनारे बैठा जीवन विचारों में खोया - खोया सामने झूमते भागते वृक्षों व खेतों को देखता चला जा रहा था।गाड़ी की सीटी की आवाज सुनाई दी, गति धीमी होने लगी,और धीमी और धीमी फिर गाड़ी रुक गई।मेल-गाड़ी और यह छोटा सा स्टेशन।यहाँ गाड़ी का रुकना सभी को आश्चर्य में डाल रहा था।सहसा काला परिधान धारण किये हुये टी. टी.ने डिब्बे में प्रवेश किया 'लो यमदूत आ गया' जीवन के मुख से यूँ ही निकल पड़ा। ' टिकिट् टिकिट्।'   दूसरे किनारे से चेक करता हुआ, वह चला आ रहा था।जीवन समझ नहीं पा रहा था, तभी शौचालय पर उसकी नजर गई और वह धीरे से खिसक कर उसी में घुस गया।   और गाड़ी चल दी । - खट् खट्, टी.टी. ने दरवाजा ठोंका।    'अरे साहब,कम से कम उसे टट्टी तो कर लेने दीजिये!-'किसी बूढ़े ने कहा।     'आप समझते नहीं, यह बेईमान हमको छका रहा है।देखते हैं कब तक नहीं निकलता है।यहीं खड़ा रहूँगा मैं।आज इसे सबक सिखा के छोड़ूँगा।'   'तुम क्या समझते हो तुम्हारे बाप का डिब्बा है?हमने भी पैसे दिये हैं।'    'अबे ओ. जबान सम्हाल कर बोल, नहीं तो चलती गाड़ी से उठाकर फेंक दूँगा। - ...