कहाँ करे विश्राम
कहाँ करे विश्राम सुबह हुई जीवन की मेरे और हुई कब शाम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। नयना हो गये गंगा-यमुना अश्रु न फिर भी रीते । जीवन रण में लड़े बहुत पर एक युद्ध न जीते ॥ हुई कौन सी गलती जिससे हुए विधाता वाम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। उड़ पाऊं उन्मुक्त गगन में समझू जग की रीत । तब तक हाथ छुड़ाकर भागा मेरे मन का मीत सबके वादे झूठे निकले कोई न आया काम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। एक रतन ऐसा भी पाया जिसे संजोते जनम गँवाय । राह कटीली राह रसीली कहीं धुप तो कहीं है छाया ॥ पागल मन यह समझ न पाये कहाँ करे विश्राम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। जगती का ये खेल अनूठा बिना पिया के जीवन ठुठा। माया में मन समझ न पाया कौन है सच्चा , कौन है झूठा ॥ अर्थ ढूंढ़ता रहा अहर्निश किन्तु रहा निष्काम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।