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कहाँ करे विश्राम

कहाँ करे विश्राम सुबह हुई जीवन की मेरे और हुई कब शाम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। नयना हो गये गंगा-यमुना अश्रु न फिर भी रीते । जीवन रण में लड़े बहुत पर एक युद्ध न जीते ॥ हुई कौन सी गलती जिससे हुए विधाता वाम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। उड़ पाऊं उन्मुक्त गगन में समझू जग की रीत । तब तक हाथ छुड़ाकर भागा मेरे मन का मीत सबके वादे झूठे निकले कोई न आया काम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। एक रतन ऐसा भी पाया जिसे संजोते जनम गँवाय । राह कटीली राह रसीली कहीं धुप तो कहीं है छाया ॥ पागल मन यह समझ न पाये कहाँ करे विश्राम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।। जगती का ये खेल अनूठा बिना पिया के जीवन ठुठा। माया में मन समझ न पाया कौन है सच्चा , कौन है झूठा ॥ अर्थ ढूंढ़ता रहा अहर्निश किन्तु रहा निष्काम । पता चले इससे पहले कि सखे हुआ बदनाम ।।

नयनों की प्याली में अमृत

नयनों की प्याली में अमृत नयनों की प्याली में अमृत बार - बार तुमने परसा है। लुक छिपकर तेरा वह मिलना गन्धित पुष्प कली सा खिलना कुंचित केशों का विन्यास तेरे अधरों का मधुहा स याद मुझे है, लखने खातिर बार - बार ये मन तरसा है। नयनों की प्याली में अमृत बार - बार तुमने परसा है। चैत चाँदनी की वे रातें तेरी मधुर - मधुर वे बातें अमराई के मध्य बोलना मीठा - मीठा दर्द घोलना खेल - खेल में बीत गये दिन आखों ने सब कुछ दरसा है। नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥ खुश होना और कभी रिसाना रोब देखाना और मनाना बिन बोले तेरा रह जाना आखों से सब कुछ कह जाना तेरी मनवाली कर - करके , बार - बार ये मन हरषा है। नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥ रिस्ते नाते टूट गये सब काफी पीछे छूट गये सब हाथों को ही बस मलना है निरा अकेले ही चलना है । जब -जब याद किया मैंने इन आखों से ही मन बरषा है। नयनों की प्याली में अमृत बार- बार तुमने परसा है ॥

प्रीत की चुनर रंगा दो

प्रीत की चुनर रंगा दो कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो सत्य को मैं सत्य मानु झूठ को पहचान पाऊ नेत्र से जो दूर है अस्तित्व उसका जान पाऊं दूर होवे द्वेष ईर्ष्या मन का मेरे तम भगा दो कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो बात कैसी है अनूठी प्रीत करना और रोना रत्न अपने हाथ लेकर और अपने हाथ खोना मैं समझ पाऊं सभी कुछ भाव तुम मेरे जगा दो कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो दीप लेकर आ पड़ा है द्वार पर कोई पुजारी मन करे करना वही तुम प्रार्थना सुन लो हमारी । बस यही इच्छा कि फिर से प्रीत कि चूनर रंगा दो कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो मै स्वयं को भुला जाऊं इस तरह कि प्रीत दे दो , रात - दिन मै गीत गाऊ इस तरह के गीत दे दो दे नहीं सकती तो मोइके से मुझे डोली मँगा दो कुछ कहूँ इससे की पहले होठ पर ताले लगा दो

अर्घ्य्र नयन से

अर्घ्य्र नयन से पाँव हमारे गावं तुम्हारे वाले रस्ते बढ़ जाते हैं। पवन झकोरों संग उड़-उड़ कर अन्शुमालिनी पीछे मुड-कर रेखाविद सी हस्त रेखाएं मेरी आकार पढ़ जाते है पाँव हमारे गावं तुम्हारे वाले रस्ते बढ़ जाते हैं। कौन भाग की बांचे पाती कौन लुटाये जीवन थाती अमराई में आते ही वे गीत पुराने कढ़ जाते हैं पाँव हमारे गावं तुम्हारे वाले रस्ते बढ़ जाते हैं। मेरा हाथ रहा है खाली नहीं पास में पूजा थाली गंगा जल की बात सोचते अर्घ्य्र नयन से कढ़ जाते हैं पाँव हमारे गावं तुम्हारे वाले रस्ते बढ़ जाते हैं।

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संक्षिप्त - परिचय नाम- डॉ.उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन' पिता- स्व 0 रामचंद्र चतुर्वेदी माता- स्व 0 भगवती देवी जन्मतिथि- १/३/१९५८ जन्मस्थान- नेमदांड, मऊ (उत्तर प्रदेश) शिक्षा- नव्य व्याकरण आचार्य , साहित्यरत्न,विद्या वारिधि सम्प्रति- व्याकरण- प्रवक्ता, श्री आदर्श सेवा संस्कृत विद्यालय,ईश्वरगंगी,वाराणसी -१ प्रकाशित कृतियाँ- नयी लकीरें,मृग तृष्णा,देवी माँ,सुहागिन (कहानी संग्रह) रंग के छींटे (कविता संग्रह) स्वर आज दिया तुमने (मुक्तक संग्रह) स्वर व्यंजन (बाल कविता संग्रह) हिंदी ( प्रशस्तिकाव्य) गंगा (खंडकाव्य) सहजनिबंध (निबंध सग्रह) छल गया मै (मुक्तक संग्रह) आत्मकथ्य- मन की अटल गहराइयों में बैठे उस कवी ह्रदय को जिसे आज तक पहचान नहीं पाया,जब समाज के क्रूर ठीकेदारों द्वारा आचरित आचरणों से ठेस लगती है तो कंचन कर कलम पकड़ने को बाध्य हो जाता है और कुछ न कुछ लिखने लगता है, या यूँ कहिये कि कागज काला करने लग जाता है और बाद में उसे ही सहृदय गण पढने के बाद कहानी या कविता कहने लग जाते हैं। कभी - कभी क्या प्रायः ऐसा लगता है कि यह समाज मेरे लायक नहीं है या मैं ही इस समाज के लाय...

दरिया में अब नाव नहीं है

दरिया में अब नाव नहीं है, अमराई में छाँव नहीं है गांव बहुत से होगे लेकिन मेरे जैसा गांव नहीं है पग -पग पर छेका करते है आँखों को सेका करते हैं घुरहू के आँगन में रोंड़ा धनिया पर फेका करते हैं दो क्षण को जो सुख दे जाये वह लोगो में भाव नहीं है गांव बहुत से होंगे लेकिन मेरे जैसा गांव नहीं है चाल चलन है रहन नहीं है द्वार बहुत है सहन नहीं है कहने को ये गांव की मेरी लड़की है पर बहन नहीं है कौवा मामा कभी बोलते थे वैसा अब काँव नहीं है गांव बहुत से होंगे लेकिन मेरे जैसा गांव नहीं है बिच्छु जैसे डंक नहीं हैं सब राजा हैं , रंक नहीं हैं मेरी पीड़ा को सहला दे आँचल वैसे अंक नहीं हैं दरिया दिल वाली दरिया है पर दरिया में नांव नहीं है पहले जैसा राज नहीं है स्वर है लेकिन साज नहीं है साडी में अब भी घुघट है किन्तु आंख में लाज नहीं है श्रद्धा भाव जन्मने वाली पायल है पर पाँव नहीं है गांव बहुत से होंगे लेकिन मेरे जैसा गांव नहीं हैं